Sunday, May 8, 2011

युवाओं की ओर से एक चिट्ठी

प्रिय सोनियाजी, मैं स्वयं कभी खुले पत्रों का हिमायती नहीं रहा। आखिर एक ऐसे पत्र को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करने में क्या तुक है, जिसे किसी एक व्यक्ति के लिए लिखा गया हो? बहरहाल सोनियाजी, मेरे पास आपका ईमेल आईडी नहीं है और मुझे नहीं लगता कि आप फेसबुक पर होंगी (ट्विटर पर तो आप निश्चित ही नहीं हैं)। आपको लिखी जाने वाली नियमित चिट्ठियों को आपके सभासदों से होकर आप तक पहुंचने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता होगा। इसीलिए मुझे खुला पत्र ही सबसे अच्छा विकल्प लगा। लेकिन यहां मैं केवल अपनी ही बातें नहीं कह रहा हूं। ये वे बातें हैं, जो आज देश के अधिकांश युवा महसूस करते हैं।

सीधी-सी बात है : देश भ्रष्टाचार से निजात पाना चाहता है और समाधान चाहे जो हों, उन्हें अमल में लाने के लिए आपको एक निर्णायक भूमिका निभानी होगी। मुझे नहीं लगता कि भ्रष्टाचार में आपकी कोई निजी दिलचस्पी होगी। आप जिस पड़ाव पर हैं, उसमें आपके लिए धन की अहमियत बहुत कम होगी। फिर भी पार्टी चलाने के लिए बड़े पैमाने पर धनराशि की दरकार होती है। इसके कारण राजनेताओं को कुछ नैतिक समझौते भी करने पड़ते हैं। आज भ्रष्टाचार के आंकड़े इस सीमा तक पहुंच चुके हैं कि उनकी गिनती करने में किसी डिजिटल केलकुलेटर को भी खासी मुश्किल हो। एक के बाद एक हो रहे घोटाले बताते हैं कि हमने ऐसा तंत्र रचा है, जिसमें बुराई को प्रोत्साहन दिया जाता है और जहां पहली दुनिया का एक हिस्सा बनने के भारत के स्वप्न को लगातार खतरा बना रहता है।

हाल ही में आपके पुत्र राहुल ने कहा था कि भ्रष्टाचार के कारण आम आदमी तक वैश्वीकरण के लाभ नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह पूरी तरह सच है। वास्तव में भ्रष्टाचार न केवल हमारे मौजूदा लाभ को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि वह देश के नौजवानों के भविष्य की संभावनाओं को भी क्षति पहुंचाता है। एक अर्थ में भ्रष्टाचार आतंकवाद से भी बदतर है। आतंकवादी सड़कों, हवाई अड्डों और पॉवर प्लांटों को निशाना बनाते हैं और निर्दोष नागरिकों की जान लेते हैं। लेकिन एक भ्रष्टाचारी नेता अस्पताल ही नहीं बनने देता, जिसका मतलब यह होता है कि जिन निर्दोष नागरिकों की जानें बचाई जा सकती थीं, उन्हें नहीं बचाया जा सकता।

आपने कहा था कि भ्रष्टाचार एक रोग है। आपकी इस बात से निराशा झलकती है, क्योंकि रोग तो प्राकृतिक कारणों से होता है। लेकिन भ्रष्टाचार के लिए कोई कीटाणु जिम्मेदार नहीं हैं। भ्रष्टाचार की जड़ है निरंकुश सत्ता। इस बात को एक छोटे-से उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। बिजली का आविष्कार एक महान खोज थी, जिसकी वजह से हमारे घरों में रोशनी हुई और हम सुख-सुविधा के विभिन्न साधनों का उपयोग कर पाए। लेकिन हम तक बिजली पहुंचने से पहले उसे विभिन्न सबस्टेशनों से होकर गुजरना पड़ता है, जहां वोल्टेज और करंट पर नियंत्रण रखा जाता है। यदि बिजली प्रदाय अनियंत्रित हो तो वह हमारे घर में आग भी लगा सकती है। भारत में राजनीतिक तंत्र पूरी तरह निरंकुश है। हमारे सांसदगण अपने आपको कोई जागीरदार समझते हैं। वे अपनी सत्ता का दुरुपयोग करते हुए जो चाहते हैं, करते हैं।

यदि आप इस ‘रोग’ का निदान करना चाहती हैं (जो कि आप कर सकती हैं) तो आपको संसद में एक ‘राजनीतिक उत्तरदायित्व विधेयक’(पॉलिटिकल अकाउंटेबिलिटी बिल) पारित करना होगा। साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक स्वतंत्र परिषद भी गठित करनी होगी। यह परिषद किसी नेता के अधीन नहीं होगी, बल्कि उसके पास यह शक्ति होगी कि वह किसी भी राजनेता पर मुकदमा चला सके। पहली दुनिया के तकरीबन सभी देशों में यह व्यवस्था है। जब तक ये बदलाव नहीं किए जाते, तब तक चाहे कितने ही बेहतरीन भाषण दिए जाते रहें, बीमारी बरकरार रहेगी।

दोषी नेताओं को दंडित करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह समझना है कि नेता आखिर भ्रष्टाचार क्यों करते हैं। आपकी पार्टी के कुछ विचार अच्छे हैं, खासतौर पर युवाओं को राजनीति में सक्रिय करने के लिए बड़े पैमाने पर किए जा रहे प्रयास। आपके पुत्र ने पार्टी के इस संदेश को प्रचारित करने के लिए देशभर की यात्रा की है। लेकिन मैं एक सीधा-सा सवाल पूछना चाहता हूं : जब कोई नौजवान युवा कांग्रेस (या किसी भी पार्टी की युवा शाखा) में शामिल होता है तो क्या होता है? पार्टी के लिए अच्छा प्रदर्शन करने के लिए उसे बहुत ऊर्जा खपानी पड़ती है। लेकिन राजनीतिक दलों के यहां औपचारिक वेतन प्रणाली नहीं होती है। ऐसे में वह युवा कैसे अपना जीवनयापन करेगा? निश्चित ही उसके सामने एकमात्र रास्ता यही रह जाता है कि वह छोटा-मोटा भ्रष्टाचार करे। इसी तरह एक युवा धीरे-धीरे भ्रष्ट व्यक्ति बन जाता है। ऐसी स्थिति में क्या आप किसी शिक्षित प्रबुद्ध युवा को यह सलाह देंगी कि वह राजनीति में आए? इसके स्थान पर अगर एक उपयुक्त वेतन प्रणाली अमल में लाई जाए तो आप पाएंगी कि पेशेवर रूप से कुशल युवा आपकी पार्टी जॉइन कर रहे हैं। जब तक ये सुधार नहीं किए जाते, तब तक युवाओं की सहभागिता का नारा बेकार ही साबित होगा। एक अन्य बेतुका नियम है चुनाव प्रचार अभियान में 25 लाख रुपयों की व्यय सीमा। मेरे सांसद मित्र मुझे बताते हैं कि वास्तव में हर संसदीय क्षेत्र में चुनाव प्रचार अभियान में औसतन छह करोड़ रुपए खर्च होते हैं। यह पैसा कहां से आता है? जाहिर है भ्रष्टाचार के बिना यह संभव नहीं। ऐसे में क्या वैध फंडरेजिंग प्रणालियों का निर्धारण नहीं किया जाना चाहिए?

परिस्थितियों को बदलना आसान नहीं होता, लेकिन इसके बावजूद हमें प्रयास करने होते हैं। अन्य किसी भी व्यक्ति की तुलना में आप देश की स्थिति को बदलने में सर्वाधिक सक्षम हैं। करोड़ों युवा आज आपसे यही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या आप कोई बदलाव लाएंगी?
भवदीय ‘भारत’

चेतन भगत
लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं।

क्या मैं विनम्र हूं?

एक शाम मैंने अपनी बेटी माला और नाती मैना से जानना चाहा कि क्या मैं वास्तव में विनम्र हूं। मैंने उनसे अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त करने को कहा। उन्होंने साफ-साफ कह दिया कि मैं विनम्र व्यक्ति नहीं हूं। शायद वे दोनों सही हैं। अलबत्ता मैं हमेशा अपने ही बारे में बात नहीं करता, लेकिन यह जरूर सच है कि मैं हमेशा अपने ही बारे में सोचता रहता हूं। मैं विनम्रता की परीक्षा में फेल हो गया हूं।

अपने लंबे जीवन में जिन आकर्षक और जीवंत महिलाओं से मेरी भेंट हुई, धर्मा कुमार उनमें से एक थीं। लेकिन वे बहुत गर्ममिजाज भी थीं। उनके बारे में कभी सही-सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता था कि वे कब क्या कह देंगी। अपने इसी मिजाज के कारण उन्होंने अपने कई मित्रों को गंवा दिया था, जिनमें मैं भी शामिल हूं। कुछ साल पहले ब्रेन टच्यूमर से उनकी मृत्यु हो गई। उनकी एकमात्र संतान हैं राधा कुमार। राधा कुमार उन तीन वार्ताकारों में से एक हैं, जो कश्मीर घाटी में अमन-चैन कायम करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।

मुझे धर्मा कुमार की याद तब आई, जब मैंने हिंदी के इन शब्दों को सुना : विनय, विनीत, विनम्रता। मैं उर्दू और पंजाबी में इनके समकक्ष केवल एक ही शब्द के बारे में सोच पाता हूं : मिटा हुआ। धर्मा कुमार अक्सर अपने चचेरे भाई राघवन अय्यर के बारे में बताया करती थीं, जो हर परीक्षा में अव्वल रहते थे। वे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष चुने गए थे। अय्यर का यह मानना था कि चुनाव जीतने के लिए वोट मांगना या कैनवासिंग करना शालीन आचरण की श्रेणी में नहीं आता है। उन्हें स्टूडेंट यूनियन का चुनाव जिताने में उनके समर्थकों और प्रशंसकों का योगदान था। जैसे ही चुनाव परिणामों की घोषणा हुई, अय्यर के समर्थक दौड़ते हुए उनके कमरे में आए और उन्हें यह खुशखबरी सुनाई। अय्यर पद्मासन की मुद्रा में फर्श पर बैठे थे और उनकी आंखें मुंदी हुई थीं। उनके मित्र जोरों से चिल्लाए : ‘अय्यर, तुम चुनाव जीत गए’। अय्यर ने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी ऊपर उठाई और धीमे से बुदबुदाते हुए कहा : ‘हे ईश्वर, यह तुम्हारी विजय है!’

अय्यर के बारे में धर्मा कुमार इससे भी दिलचस्प एक और कहानी सुनाया करती थीं। कहानी कुछ इस तरह थी : एक बार अय्यर अपने समर्थकों से घिरे हुए थे। उनमें से एक ने उनसे पूछा : ‘अय्यर, तुमने अपने जीवन में इतनी सारी उपलब्धियां हासिल की हैं। इसके बावजूद तुम इतने विनम्र कैसे रह पाते हो?’ अय्यर ने जवाब दिया : ‘सवाल बहुत अच्छा है। वास्तव में मैंने एक फॉमरूले की ईजाद की है, जिसका नाम है : आत्म-विलोपन। मैं हर सुबह फर्श पर ध्यान की मुद्रा में बैठ जाता हूं और मन ही मन यह दोहराने लगता हूं कि मैं वह राघवन अय्यर नहीं हूं, जो मद्रास यूनिवर्सिटी से फस्र्ट क्लास में पास हुआ, मैं वह राघवन अय्यर नहीं हूं, जो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से भी फस्र्ट क्लास रहा, मैं वह राघवन अय्यर नहीं हूं, जो स्टूडेंट्स यूनियन का निर्वाचित अध्यक्ष है, मैं पूर्व दिशा से आया मेधावी दार्शनिक राघवन अय्यर नहीं हूं, मैं केवल दिव्य शक्तियों का प्रवक्ता हूं।’ अय्यर यही ध्यान शाम के समय भी करते थे और इन सभी पंक्तियों को एक बार फिर दोहराते थे। लेकिन वे अंतिम पंक्ति में थोड़ा फेरबदल कर देते थे। शाम को वे स्वयं को ‘दिव्य शक्तियों का प्रवक्ता’ के स्थान पर ‘महात्माओं का माध्यम मात्र’ कहते थे।

हम भारतीय लोग स्वभावत: विनम्र होते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि हम लोग विनम्रता के आराधक हैं। पश्चिम में जब लोग आपस में मिलते हैं तो हाथ मिलाकर जोशोखरोश से अभिवादन करते हैं। जबकि हम किसी से भेंट करने पर विनम्रता से हाथ जोड़ लेते हैं, जैसे प्रार्थना कर रहे हों। हम अभिवादन के रूप में नमस्ते, नमस्कार, वणक्कम या सत श्री अकाल कहते हैं। अदब की यही तहजीब मुस्लिमों में भी है। वे अभिवादन में झुककर सलाम करते हैं और दाहिने हाथ से अपनी पेशानी को छूते हैं। लेकिन वास्तव में विनम्रता एक दुर्लभ गुण है। हम अक्सर अपने बारे में ही बात करना पसंद करते हैं। कोई भी व्यक्ति, जो हमेशा अपने ही बारे में बात करना चाहता है, उसे विनम्र नहीं कहा जा सकता। राजनेता विनम्र नहीं हो सकते, क्योंकि उन्हें बार-बार सभी को यह बताना पड़ता है कि वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से बेहतर हैं। यही स्थिति धनी लोगों की भी है। हो सकता है कि ऊपरी तौर पर वे विनम्र और शिष्ट दिखाई दें, लेकिन भीतर से वे अहंकारी होते हैं। धन-दौलत के साथ अहंकार भी आ ही जाता है। धनियों के बारे में रॉबर्ट बर्टन ने अपनी किताब द एनाटमी ऑफ मेलंकली में सच ही लिखा था : ‘उन्हें अपनी विनम्रता पर गर्व होता है। उन्हें इस बात पर भी गर्व होता है कि उन्हें कोई गर्व नहीं है।’

मुझे लगता था कि मैं विनम्र व्यक्ति हूं। एक शाम मैंने अपनी बेटी और अपनी नाती से जानना चाहा कि क्या मैं वास्तव में विनम्र हूं। मैंने उनसे अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त करने को कहा। मेरी नातिन मैना, जो अपनी अक्खड़ता और मुंहफटपन के लिए घरभर में जानी जाती है, ने जवाब दिया : ‘आप और विनम्र! कहीं आप मजाक तो नहीं कर रहे? आपको अपनी खुशामद करवाना पसंद है। जब महिलाएं आपको कबाब, खीर, केक और गुलदस्ते भेजती हैं तो आपको बहुत अच्छा लगता है। इससे आपके अहंकार की तुष्टि होती है। कुछ लोग हैं, जो आपको विंटेज स्कॉच परोसते हैं और इस तरह आपकी खुशामद करते हैं, जैसे आप कोई छोटे-मोटे मसीहा हों।’

मानो इतना ही काफी नहीं था। इसके बाद मेरी बेटी माला ने बोलना शुरू किया। उसने कहा : ‘जब आपके श्रोता आपकी चुटीली और चटपटी बातों से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं तो आप उनसे अपेक्षा करते हैं कि वे आपके बारे में अच्छी-अच्छी बातें बोलें। लेकिन जब वे चुप हो जाते हैं तो आप ऊबने लगते हैं और आप उन लोगों को वहां से चले जाने को कह देते हैं। ऐसे में यह कैसे संभव है कि आपको एक विनम्र व्यक्ति कहा जाए?’

शायद वे दोनों सही हैं। अलबत्ता मैं हमेशा अपने ही बारे में बात नहीं करता, लेकिन यह जरूर सच है कि मैं हमेशा अपने ही बारे में सोचता रहता हूं। मैं विनम्रता की परीक्षा में फेल हो गया हूं। मैं हमेशा गुरु नानक की यह बात याद रखता हूं : अहंकार बहुत बड़ा रोग है, लेकिन यही रोग की दवा भी है।

आपको यह नहीं मालूम होगा
1 से लेकर 99 तक की अंग्रेजी वर्तनी में ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’ और ‘डी’ अक्षर कहीं भी नहीं आते हैं।
(‘हंड्रेड’ शब्द में पहली बार ‘डी’ अक्षर का इस्तेमाल होता है)

1 से लेकर 999 तक की अंग्रेजी वर्तनी में ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ अक्षर कहीं भी नहीं आते हैं।
(‘थाउजेंड’ शब्द में पहली बार ‘ए’ अक्षर का इस्तेमाल होता है।)

1 से लेकर 999999999 तक की अंग्रेजी वर्तनी में ‘बी’ और ‘सी’ अक्षर कहीं भी नहीं आते हैं।
(‘बिलियन’ शब्द में ‘बी’ अक्षर पहली बार आता है।)

और अंग्रेजी की समूची गणना में ‘सी’ अक्षर का इस्तेमाल कहीं भी, किसी भी वर्तनी में नहीं होता है।
(सौजन्य : विपिन बख्शी, दिल्ली)

आखिर क्यों आता है गुस्सा?

हमें नहीं मालूम गुस्सा आता किधर से है? ऐसा क्यों है कि कुछ लोग बेहद तुनकमिजाज होते हैं, जबकि कुछ अन्य बहुत उकसाए जाने पर भी अपना मानसिक संतुलन और शांत स्वभाव बनाए रखते हैं? क्या गुस्सा हमारे डीएनए में होता है? क्या यह बुरी सेहत या खराब मनोदशा का परिणाम है या फिर परिस्थितियां ही हमें अपना आपा खो देने के लिए मजबूर कर देती हैं?

मेरे एक मुस्लिम मित्र थे। बहुत काबिल और प्रतिभाशाली। उनका आईक्यू बहुत अच्छा था। वे बहुत अच्छा लिखते थे और उनके लेख देश के जाने-माने जर्नल्स में छपते थे। उनकी कुछ किताबें भी प्रकाशित हुई थीं। वे सुसंस्कृत, शिष्ट और जहीन थे। उनके घर पर उर्दू के कुछ आला शायरों से मेरी भेंट हुई थी, जिनमें अली सरदार जाफरी और साहिर लुधियानवी भी शामिल थे। सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने अपनी कौम को आगे बढ़ाने के लिए जितना काम किया, उतना बहुत कम मुस्लिमों ने किया होगा। उन्होंने मुंबई और औरंगाबाद में कई स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना की थी। राजनीति में भी उनका खासा दखल था। उन्होंने कई चुनाव जीते थे और वे कई वर्षो तक महाराष्ट्र सरकार में मंत्री थे। इसके बाद उन्होंने संसद तक का सफर तय किया। बहुतों को उम्मीद थी कि वे इंदिरा गांधी की सरकार में कैबिनेट मंत्री बनेंगे। शीर्ष के कई राजनेताओं से उनके गहरे ताल्लुक थे।
लेकिन उनमें एक खामी थी। गुस्सा हमेशा उनकी नाक पर बैठा रहता था। अक्सर वे गुस्से में अपना आपा खो बैठते थे। अलबत्ता वे बाद में अपने बरताव के लिए माफी भी मांगते थे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती थी। इंदिरा गांधी को उनके इस गुस्सैल मिजाज के बारे में मालूम था, इसीलिए उन्होंने उन्हें अपना मंत्री नहीं बनाया। उन्होंने अपनी इस एक कमजोरी के लिए भारी कीमत चुकाई। क्रोध को मानवीय स्वभाव की पांच बुराइयों में से एक बताया गया है। अन्य चार हैं : काम, लोभ, मोह और अहंकार। लेकिन हम नहीं जानते कि आखिर क्रोध आता किधर से है? न ही हमें आम तौर पर पता होता है कि इससे मुक्त कैसे हुआ जाए। ऐसा क्यों है कि कुछ लोग बेहद तुनकमिजाज होते हैं, जबकि कुछ अन्य बहुत उकसाए जाने पर भी अपना मानसिक संतुलन और शांत स्वभाव बनाए रखते हैं? क्या गुस्सा हमारे डीएनए में होता है? क्या यह बुरी सेहत या खराब मनोदशा का परिणाम है या फिर परिस्थितियां हमें अपना आपा खो देने के लिए विवश कर देती हैं?

मुझे इन सभी सवालों के जवाब नहीं पता। लेकिन मैं लोगों के तरह-तरह के गुस्सों का गवाह रहा हूं। जब मैं मुंबई में रहता था, तो मैं एक व्यक्ति को जानता था। वह मेरे घर के सामने रहता था। माह में एकाध बार ऐसा जरूर होता कि वह व्यक्ति गुस्से के मारे अपना आपा खो बैठता था। वह गुस्से में खूब जोरों से चीखता-चिल्लाता था और अपने कमरे में चक्कर काटता रहता था। इस दौरान उसकी पत्नी सिर झुकाए बैठी रहती। उसके दोनों डरे-सहमे बच्चे कसकर मां का आंचल पकड़ लेते थे। उस व्यक्ति का गुस्सा तकरीबन पंद्रह मिनट तक रहता, जिसके चरम पर वह अपना सिर दीवार से टकराने लगता। कई बार उसका सिर लहूलुहान हो जाता था। जब उसका गुस्सा शांत होता तो वह कुछ समय के लिए फर्श पर बैठा रहता और फिर अंतत: भोजन करने के लिए उठता था। कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हमेशा तमतमाए हुए रहते हैं, लेकिन वे गुस्से में कभी आपे से बाहर नहीं होते। ऐसे लोगों की सोहबत बुरी होती है। इनमें से अधिकतर लोग अच्छी पृष्ठभूमि के होते हैं। विलियम कर्टिस ने सच ही कहा है : ‘गुस्सा एक महंगी विलासिता है, जिसे केवल अच्छा पैसा कमाने वाले लोग ही वहन कर सकते हैं।’

कैप्टन मनमोहन सिंह : कुछ ही लोग ऐसे हैं, जिनकी उपलब्धियों ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि इतिहास की किताबों में उनका नाम सुरक्षित रहेगा। इन्हीं में से एक हैं कैप्टन एमएस कोहली, जिन्होंने वर्ष 1965 में माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई मापने वाले भारतीय पर्वतारोहियों के दल का नेतृत्व किया था। दुनिया के इस सबसे ऊंचे पर्वत शिखर पर पहुंचने वाला भारत दुनिया का चौथा देश बना था। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य हस्तियों ने कैप्टन कोहली का सम्मान किया है। मैं पहले भी उन पर लिख चुका हूं। मैं अपनी कुछ पंक्तियां दोहरा रहा हूं : ‘कैप्टन कोहली और मौजूदा प्रधानमंत्री में कुछ बातें समान हैं। उनका नाम समान है : मनमोहन सिंह कोहली। उनकी पैदाइश उत्तर-पश्चिमी पंजाब के उसी हिस्से में हुई, जो अब पाकिस्तान में रह गया है। उनकी आयु भी तकरीबन एक-सी ही है। और उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है।’

एक वाक्य, दो अर्थ : पैरा-प्रोस्डोकियन एक तरह का फिगर ऑफ स्पीच है, जिसमें किसी वाक्य का अंतिम अंश रोचक और अप्रत्याशित होता है और पाठक को वाक्य के प्रारंभिक अंश पर एक बार फिर गौर करने को बाध्य कर देता है। इस तरह के वाक्यों का अंतिम अंश अक्सर पहले अंश के अर्थो को बदल देता है। व्यंग्यकारों में यह विधा बहुत प्रचलित है। मिसाल के तौर पर ये कुछ रोचक पैरा-प्रोस्डोकियन वाक्य देखिए :
1.मैंने ईश्वर से एक बाइक मांगी, लेकिन मुझे पता था कि ईश्वर हमारी ऐसी इच्छाएं पूरी नहीं करता। इसलिए मैंने एक बाइक चुरा ली और ईश्वर से माफी मांग ली।
2. चर्च जानेभर से ही हम क्रिश्चियन नहीं हो जाते। ठीक उसी तरह जैसे गैरेज में खड़े होनेभर से ही हम मोटरकार नहीं हो जाते।
3. रोशनी की रफ्तार आवाज की रफ्तार से तेज होती है। इसीलिए कुछ लोग केवल तभी तक चमकदार मालूम होते हैं, जब तक वे अपना मुंह नहीं खोलते।
4. अगर मैं आपसे सहमत हो गया तो हम दोनों ही गलत होंगे।
5. समाचार वह होते हैं, जिनकी शुरुआत ‘गुड मॉर्निग’ से होती है लेकिन उसके बाद उनमें तफसील से यह बताया जाता है कि यह गुड मॉर्निग क्यों नहीं है।
6.किसी एक व्यक्ति के विचारों को अपना बताना चोरी है। लेकिन बहुत से लोगों के विचारों को अपना बताना शोध है।
7. बस स्टेशन वह है, जहां बस रुकती है। रेलवे स्टेशन वह है, जहां ट्रेन रुकती है। और वर्क स्टेशन वह है, जहां कोई भी कामकाज नहीं होता।
8.बैंक वह है, जो केवल तभी आपको कर्ज में पैसा देता है, जब आप दस्तावेजों से यह साबित कर दें कि आपको पैसे की जरूरत नहीं है।
9. हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है। हर असफल पुरुष के पीछे कोई और महिला होती है।
10. हमेशा किसी निराशावादी से ही पैसा उधार लें। वह कभी यह उम्मीद नहीं करेगा कि उधार चुकाया जाएगा।
11. एक कूटनीतिज्ञ वह है, जो आपको जहन्नुम में जाने को इस तरह कहता है कि आप सुखद यात्रा की तैयारियां करने लगते हैं।
12. पैसे से सुख नहीं खरीदा जा सकता। लेकिन इससे दुख को कम जरूर किया जा सकता है।
13. नॉस्टेल्जिया का अर्थ है किसी चीज को इस तरह याद करना, जैसी वह कतई नहीं थी।
(सौजन्य : विपिन बख्शी, नईदिल्ली)

इतिहास में गुम हुए संघर्ष

पोरस अपनी हिम्मत और बहादुरी के लिए विख्यात था। जब सिकंदर हिंदुस्तान आया और जेहलम के समीप पोरस के साथ उसका संघर्ष हुआ, तब पोरस को खुखरायनों का भरपूर समर्थन मिला था। इस तरह पोरस, जो स्वयं सभरवाल उपजाति का था और खुखरायन जाति समूह का एक हिस्सा था, उनका नेता बन गया।

खुखरायन, पंजाबी खत्रियों का एक जाति समूह है। इसमें कोहली (प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरशरन कौर कोहली हैं), साहनी, चड्ढा, आनंद, सभरवाल आदि उपजातियां होती हैं। इनके अलावा संभवत: इन्हीं से संबंधित कुछ अन्य उपजातियां भी हैं, जिनके लोग उनके साथ वैवाहिक संबंध निर्मित करना पसंद करते हैं। मैं खुखरायन जाति समूह के कई लोगों को जानता हूं, लेकिन उनमें से किसी को भी यह पता नहीं था कि खुखरायन शब्द कब और कैसे अस्तित्व में आया। मुझे इस सवाल का जवाब हाल ही में एक किताब में मिला। यह किताब आईपी आनंद की आत्मकथा ए क्रूसेडर्स सेंचुरी : इन परस्यूट ऑफ एथिकल वेल्यूज (केडब्ल्यू प्रकाशन से प्रकाशित) है। वे लिखते हैं, ‘सदियों पहले आर्यो ने दक्कन की ओर चलना शुरू किया था। पोरस के जमाने से ही बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के मध्य स्थित खोखर रियासत की कुछ जातियां भी दक्कन की ओर यात्राएं करती रही थीं। इनके वंशज खुखरायन कहलाए। पोरस का साम्राज्य जेहलम और चिनाब नदियों के बीच स्थित था। इस क्षेत्र में रहने वाले खोखरों ने राजपूत सम्राट पृथ्वीराज चौहान की हत्या का बदला लेने के लिए मुहम्मद गोरी को मौत के घाट उतार दिया था। पृथ्वीराज चौहान १२वीं सदी के उत्तरार्ध में भारतीय इतिहास के एक बेहद महत्वपूर्ण व्यक्ति थे।

‘पोरस अपनी बहादुरी के लिए विख्यात था। उसने उन सभी के समर्थन से अपने साम्राज्य का निर्माण किया था, जिन्होंने खुखरायनों पर उसके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था। जब सिकंदर हिंदुस्तान आया और जेहलम के समीप पोरस के साथ उसका संघर्ष हुआ, तब पोरस को खुखरायनों का भरपूर समर्थन मिला था। इस तरह पोरस, जो स्वयं सभरवाल उपजाति का था और खुखरायन जाति समूह का एक हिस्सा था, उनका नेता बन गया।’ इस पुस्तक के लेखक आईपी आनंद थापर ग्रुप ऑफ कंपनीज में शामिल हुए और उसकी बहुआयामी इंटरप्राइजों के मुख्य प्रवक्ता बने। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने जेल यात्राएं भी की हैं। इसी दौरान वे कई कांग्रेसी नेताओं के साथ ही जयप्रकाश नारायण के भी संपर्क में आए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के साथ भी काम किया है। आईपी आनंद बहुत अच्छी समझ रखते हैं और वे चाहते हैं कि अपनी इस समझ को वे अपने पाठकों के साथ साझा करें।

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हमारे सम्माननीय राजनेता :
चुनाव के दौरान
हमारे सम्माननीय राजनेता
फूलमालाओं से जोरदार स्वागत के बाद
भीड़भाड़ के बीच
ढोल-नगाड़ों-पटाखों
लाउडस्पीकर के संगीत
और अन्य चीजों की
ध्वनि का आनंद उठाते
दृढ़तापूर्वक सड़क पर चहलकदमी करते हैं।
जुड़े हाथों और सम्मोहक विनम्रता के साथ
हर दरवाजे को खटखटाते हैं
छद्म मुस्कराहटों के साथ मांगते हैं वोट
और उसके बाद चुपचाप अपना सामान समेटते हैं
फिर उनकी कोई खैर-खबर नहीं मिलती।
यदि वे चुनाव जीत जाएं तो तय है कि इसके बाद
अगले चुनाव में ही नमूदार होंगे।
(सौजन्य : सीजे जॉर्ज, पोएट्स इंटरनेशनल, बेंगलुरू)

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पुरुषों के जीवन के विभिन्न चरण :
सगाई के बाद : सुपरमैन
शादी के बाद : जेंटलमैन
दस साल बाद : वॉचमैन
बीस साल बाद : डॉबरमैन

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हर मां के लिए अपना बच्चा सर्वश्रेष्ठ होता है।
हर पुरुष के लिए पड़ोसी की पत्नी सर्वश्रेष्ठ होती है।

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एक व्यक्ति, जिसका जल्द ही विवाह होने वाला था, एक बुकस्टोर पर सेल्सगर्ल से पूछता है : क्या आपके यहां कोई ऐसी किताब है, जिसका शीर्षक हो ‘मैन, द मास्टर ऑफ वुमन’?
सेल्सगर्ल ने जवाब दिया : फिक्शन का सेक्शन दूसरी तरफ है सर!

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दुनिया की सबसे पतली किताब में केवल एक ही शब्द होगा : ‘सबकुछ’।
और किताब का शीर्षक होगा : ‘महिलाएं क्या चाहती हैं?’

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जो व्यक्ति गलत होने पर समर्पण कर दे, वह ईमानदार है।
जो सुनिश्चित नहीं होने पर समर्पण कर दे, वह समझदार है।
जो सही होने के बावजूद समर्पण कर दे, वह पति है।

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एक व्यक्ति को टेलीग्राम मिलता है : आपकी पत्नी की मृत्यु हो गई है। उन्हें दफनाया जाए या दाह संस्कार किया जाए?
व्यक्ति ने जवाब दिया : उसके साथ कोई भी चांस न लें। पहले दाह संस्कार करें और फिर राख को दफना दें।

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एक महिला अपनी नौकरानी से : मुझे शक है कि मेरे पति का अपनी सेक्रेटरी के साथ अफेयर है।
नौकरानी : मुझे पता है, आप मुझे जलाने के लिए ऐसा कह रही हैं।

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जीवन का तथ्य : एक महिला आपको जन्म देती है, तब आप रो रहे होते हैं। दूसरी महिला यह सुनिश्चित करती है कि आप जीवन भर आंसू बहाते रहें।

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सवाल : कानून दूसरा विवाह करने की अनुमति क्यों नहीं देता?
जवाब : क्योंकि कानून के मुताबिक किसी व्यक्ति को एक ही गुनाह के लिए दो बार सजा नहीं दी जा सकती।
(सौजन्य : विपिन बख्शी, नई दिल्ली)

खुशवंत सिंह लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।

एक नई खिचड़ी बोली का उदय

हमें शायद पूरी तरह इसका अंदाजा न हो, लेकिन भारत और पाकिस्तान का शिक्षित मध्य वर्ग एक नए किस्म की भाषा ईजाद कर रहा है, जो अंग्रेजी और हिंदुस्तानी का घालमेल है। लाहौर की मोनी मोहसिन इस खिचड़ी भाषा की मुख्य प्रतिनिधि हैं। उनकी पुस्तक द डायरी ऑफ ए सोशल बटरफ्लाय के अंश नियमित रूप से अखबारों में प्रकाशित होते रहे हैं। उनकी लेखन शैली बहुत रोचक है। वे हाल ही में अपनी दूसरी किताब टेंडर हुक्स (रैंडम हाउस से प्रकाशित) के विमोचन के लिए दिल्ली आई थीं। मैंने उनकी पहली किताब को ‘मजेदार’ बताया था। उनकी दूसरी किताब को मैं ‘मजे की इंतहा’ कहना चाहूंगा। किताब की मुख्य थीम है एक कुंवारे नौजवान के लिए उपयुक्त दुल्हन की तलाश। दुल्हन का खानदानी और खूबसूरत होना जरूरी है। साथ ही वह ऐसी भी होनी चाहिए, जो अपने साथ खासा दहेज लेकर आए। कहानी का एक बड़ा हिस्सा लड़के के परिवार की औरतों के बीच होने वाली बातचीत पर केंद्रित है। मैं यहां किताब के पहले अध्याय से एक अंश प्रस्तुत कर रहा हूं :

‘तुम जोंकर्स को जानती हो ना? ओह बाबा, तुम्हारी याददाश्त को क्या हो गया है? तुम हमारे बूढ़े अंकल की तरह सबकुछ भूलती जा रही हो। ठीक है, मैं तुम्हारे लिए एक बार फिर बता देती हूं, लेकिन यह आखिरी मर्तबा है। जोंकर्स मेरा मौसेरा भाई है। पूसी मौसी की इकलौती औलाद।’ ‘लेकिन पूसी मौसी कौन हैं?’ ‘ओहो, मुझे तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा है। अगली बार तुम पूछोगी कि तुम्हारा खुद का नाम क्या है। पूसी मौसी मम्मी की मौसेरी बहन हैं। उन दोनों की मम्मियां बहनें थीं। बूढ़े अंकल पूसी मौसी के पिता हैं।’

‘अच्छा तो मैं क्या कह रही थी? हां, जोंकर्स। कल रात उसकी सैंतीसवीं सालगिरह थी और पूसी मौसी मुझे, मम्मी और जोंकर्स को कुक्कू के रेस्टोरेंट ली गईं। यह रेस्टोरेंट पुराने शहर में बादशाही मस्जिद के करीब है। मुझे कुक्कू इसलिए अच्छा लगता है, क्योंकि सब उसे ‘तबाही’ कहकर पुकारते हैं। फॉरेनर्स तो इस पर बस फिदा ही हैं। लाहौर में मानव बमों के हरकत में आने से पहले वे बड़ी तादाद में यहां आया करते थे। अलबत्ता यह जरा बुरी बात है कि कुक्कू पुराने शहर में है, जहां के टॉयलेट्स बहुत बदबूदार हैं। लेकिन जो तवायफें पहले डायमंड मार्केट के करीब पाई जाती थीं, वे अब डिफेंस हाउसिंग सोसायटी की छोटी-छोटी कोठियों में शिफ्ट हो गई हैं। ये कोठियां उनके सियासी बॉयफेंड्रों ने उन्हें खरीदकर दी हैं। शुक्र है कि अब पुराने शहर में बुरे किस्म के किरदारों से हमारा सामना नहीं होता, बशर्ते वे कोई मानव बम न हों। इन मानव बमों के लिए हमारी फौज जिम्मेवार है, जिसकी वजह से आतंकवादी पूरे मुल्क में आराम से घूम-फिर रहे हैं। ‘कुक्कू के साथ एक और गड़बड़ यह है कि उसकी छत तक पहुंचने के लिए पचपन हजार सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, अलबत्ता वहां से दिखने वाला नजारा बेहतरीन है। यहां से सीधे मस्जिद के बरामदे में देखा जा सकता है। हालांकि धुएं के कारण हम कुछ नहीं देख सके। लाहौर की तीन ही सबसे बड़ी परेशानियां हैं : धुआं, ट्रैफिक और आतंकवादी। बाकी सब ठीकठाक है।

‘बहरहाल, पूसी मौसी ने जानू को भी डिनर पर बुलाया था। अगर तुम यह भी भूल चुकी हो कि वे कौन हैं तो मैं तुम्हें बता दूं वे मेरे शौहर हैं। लेकिन वे अपने गांव शार्कपुर में थे। ठीक है, ठीक है, मुझे कहना चाहिए हमारा गांव, क्योंकि मैं उनकी बीवी हूं। लेकिन शुक्र है कि वह वास्तव में मेरा गांव नहीं है और मैंने तीन साल से उसकी तरफ मुड़कर भी नहीं देखा है। जानू अपना आधा वक्त वहीं बिताते हैं। वे वहां खेत और आम-संतरे के बाग की देखभाल करते हैं। लेकिन चूंकि खेतीबाड़ी से मेरा कोई नाता नहीं है और मेरा काम केवल उस पैसे को खर्च करना है, जो खेतीबाड़ी से हमें मिलता है, लिहाजा मेरे लिए तो यही बेहतर होगा कि मैं लाहौर में रहूं। आखिर यहां इतने शानदार बाजार जो हैं। पूसी मौसी ने कुलचू को भी बुलाया था, लेकिन उसने यह कहकर इनकार कर दिया कि वह अपना होमवर्क कर रहा है। हालांकि मेरा ख्याल है कि वह फेसबुक पर मसरूफ था। ऐसा नन्हा किताबी कीड़ा है मेरा प्यारा बेबी।’

मोहसिन लाहौर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक फ्राइडे टाइम्स के लिए नियमित रूप से लिखती हैं। उनके उपन्यास द एंड ऑफ इनोसेंस के लिए उन्हें पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

हमारी डाक सेवाएं : भुवनेश्वर में रहने वालीं श्रीमती राव मेरे लेखन के बारे में अपनी राय व्यक्त करना चाहती थीं, लेकिन उनके पास मेरा पता नहीं था। लिहाजा उन्होंने मेरे नाम के आगे लिख दिया : ‘पगड़ीवाले’। मेरा पता भी उन्होंने कुछ इस तरह लिखा : ‘ए बी से वाई जेड एवेन्यू, नईदिल्ली’। हमारी डाक सेवाओं में काम करने वाले किसी सज्जन ने उनकी इस कारस्तानी को दुरुस्त किया और मेरा सही पता लिखकर मुझे उनका पत्र भेज दिया। मैं डाक विभाग की इस कुशलता से बहुत प्रभावित हुआ था।

बीस साल पहले तक मैं किसी ऐसे व्यक्ति को नहीं जानता था, जिसका नाम भी मेरी तरह खुशवंत सिंह हो। लेकिन अब टेलीफोन डायरेक्टरी में कई खुशवंत सिंह हैं। कभी-कभार मुझे कुछ ऐसे खत भी मिल जाते हैं, जो मेरे लिए नहीं हैं। मुझे मिलने वाले बहुत से पत्र ऐसे होते हैं, जिन पर पते के तौर पर केवल नई दिल्ली लिखा होता है। जब ऐसे पत्र भी मेरे घर पहुंच जाते हैं तो मैं हमारी डाक सेवाओं के प्रति सराहना के भाव से भर जाता हूं।

अस्सी के दशक में जब पंजाब में भिंडरावाला सक्रिय थे, तब मुझे कनाडा में बसे उनके एक समर्थक का पत्र मिला। पत्र गुरमुखी में लिखा हुआ था और उसमें मुझे भारी-भरकम गालियां दी गई थीं। पत्र पर अंग्रेजी में यह पता लिखा था : ‘नालायक खुशवंत सिंह, भारत’। हमारे डाक विभाग में से किसी सज्जन ने इस पत्र को भी मुझ तक पहुंचा दिया। मेरे मन में हमारी डाक सेवा के लिए इज्जत और बढ़ गई।

खुशवंत सिंह
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।

बोरों और कनस्तरों में बंद अनाज

इस बार जहां कुछ राज्यों में अनाज की पैदावार बहुत अच्छी हुई है। वहीं कई राज्य ऐसे भी हैं, जहां फसल अच्छी नहीं होने से खाद्यान्न की किल्लत की स्थिति पैदा हो गई है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि फसल का संरक्षण करने के हमारे तौर-तरीके पुराने और दकियानूसी हैं। हम आज भी लोहे के कनस्तरों टाट के बोरों और गोदामों का ही इस्तेमाल करते हैं। कनस्तरों में जंग लग जाता है और बोरे सड़-गल जाते हैं। नतीजा यह रहता है कि हमारा अनाज चूहों और कीड़ों-मकोड़ों का भोजन बन जाता है। हम वैक्यूम पोली सिस्टम (वीपीएस) जैसी आधुनिक स्टोरेज प्रणाली का उपयोग नहीं करते, जिसकी सहायता से अनाज को पांच से दस साल तक खुले में भी बिना किसी कवर के सुरक्षित रखा जा सकता है। अमेरिका, कनाडा, ब्राजील, चीन सहित यूरोप के लगभग सभी देश अनाज का स्टोरेज करने के लिए इसी प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं। मुझे वीपीएस के बारे में अशोक चावला नाम के एक व्यक्ति द्वारा भेजे गए एक विस्तृत प्रस्ताव के माध्यम से पता चला। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कृषि मंत्री शरद पवार को जो पत्र लिखा था, उसकी एक प्रति मुझे भी भिजवाई थी।
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ताकत की नुमाइश
हर बार गणतंत्र दिवस के दिन मेरे मन में यह सवाल उठता है कि क्या वाकई करोड़ों रुपए खर्च कर ऐसे चमक-दमक वाले आयोजन करना उचित है? साल-दर-साल इस तरह के समारोहों का आयोजन जारी रहता है। अधिकारी और नेता बदल जाते हैं, लेकिन नुमाइश की प्रणाली वही रहती है। इसके बावजूद गणतंत्र दिवस की सुबह मैं टीवी से चिपककर बैठा रहता हूं। मुझे लगता है हम भारतीयों की सोच में एक विरोधाभास है। हम चाहते हैं कि भारत को महात्मा गांधी के देश के रूप में जाना जाए। लेकिन साथ ही हम दुनिया के सामने अपने हथियारों की नुमाइश करना भी पसंद करते हैं। हम यह भी जता देना चाहते हैं कि हम अपने पर बुरी नजर डालने वालों का क्या हश्र करने में सक्षम हैं। लेकिन अपने बाहुबल का प्रदर्शन करने के बाद हमें बापू याद आते हैं। नुमाइश खत्म होने के बाद हम बापू के प्रिय भजन बजाने लग जाते हैं। वास्तव में सच्चाई तो यह है कि भारत अब गांधी का देश नहीं रह गया है। वह छल-कपट करने वाले पाखंडियों का देश बन गया है। आज हमारे देश में इसी तरह के लोग बहुतायत में हैं, जो छल-कपट करना जानते हैं।
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महंगाई का गणित
मैंने शहर देखा/मिला राजा और विदूषक से
मायूस मत होओ/मत सिकोड़ो नाक-भौं
कि जल्द ही कम हो जाएंगी जरूरी चीजों की कीमतें
चाहे सब्जी हो, या फल, या चाय
या हो ट्रेनों और बसों का किराया
चाहे हो टच्यूशन की फीस
या गुड़, दालें, घी
कीमतें बढ़ रही हैं जिस तेजी से
एक न एक दिन निश्चित ही वे
पहुंच जाएंगी एक ऐसे स्तर पर
जहां पहुंचकर खुश हो जाएंगे हमारे व्यापारीगण
लेकिन हम गरीब अपने लिए यही याद रखें
खाने से बढ़ता है वजन
लिहाजा क्यों हो निराश
हफ्ते में तीन दिन करें उपवास
और रहें चुस्त-दुरुस्त।
(सौजन्य : कुलदीप सलिल, दिल्ली)
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टिकट की हैसियत
एक बार मैं रोडवेज की बस से रोहतक से गुड़गांव तक यात्रा कर रहा था। खुल्ले पैसों की बात पर कंडक्टर का एक यात्री से झगड़ा हो गया। वह काफी क्षुब्ध था और गुस्से में बड़बड़ा रहा था। फिर उसने बुलंद आवाज में यह घोषणा कर दी : ‘मैं किसी भी रुस्तम की परवाह नहीं करता, फिर चाहे वह कई फैक्टरियों का मालिक ही क्यों न हो। मुझे किसी की भी परवाह नहीं, चाहे वह कारों की किसी कंपनी का मालिक ही क्यों न हो। मैं तो राज्य के मुख्यमंत्री तक को अपने सामने कुछ नहीं समझता तो ये क्या चीज हैं’। मुझसे रहा न गया। मैंने उससे कहा : ‘मेरे भाई, लगता है तुम बहुत बड़बोले किस्म के व्यक्ति हो। लेकिन क्या तुम मुझे बता सकते हो कि किस आधार पर तुम इतनी हिम्मत के साथ यह कह रहे हो कि तुम राज्य के मुख्यमंत्री तक को कुछ नहीं समझते?’

कंडक्टर ने बड़ी बेपरवाही से जवाब दिया : ‘मुख्यमंत्री की मेरे सामने भला क्या बिसात? मुख्यमंत्री पांच साल में बस ९क् टिकट बांटता है, जबकि मैं रोज 500 टिकट बांट देता हूं। तुम खुद अंदाजा लगा लो मैं कहां हूं और मुख्यमंत्री कहां हैं।’

मैं चुप हो गया। इसके बाद मैंने पूरी यात्रा के दौरान कंडक्टर से कोई सवाल नहीं पूछा।
(सौजन्य : रामनिवास मलिक, गुड़गांव)
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हंसना मना है
अमेरिका में चोरों को पकड़ने वाली मशीन ईजाद की गई। उसे परीक्षण के लिए विभिन्न देशों में ले जाया गया। अमेरिका में उस मशीन ने 30 मिनट में 20 चोर पकड़ लिए। ब्रिटेन में मशीन ने 30 मिनट में 50 से भी ज्यादा चोरों को पकड़ने में कामयाबी हासिल की। स्पेन में 65 चोर पकड़ाए तो घाना में यह आंकड़ा 600 तक पहुंच गया। लेकिन जब मशीन को परीक्षण के लिए भारत लाया गया तो एक भी चोर पकड़ में न आया। कारण? क्योंकि 15 मिनट बाद मशीन खुद चोरी चली गई!
(सौजन्य : विपिन बक्शी, दिल्ली)

खुशवंत सिंह
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।

वह महज इत्तफाक नहीं था

कई साल पहले की बात है। मैं मुंबई मैं था और प्रेसिडेंट होटल में ठहरा था। होटल की खिड़कियों से समुद्र का खूबसूरत नजारा दिखता था। मुझे टॉप फ्लोर पर एक कमरा दिया गया। कमरे की खिड़की से मैं मुंबई की तटरेखा को देख सकता था। साथ ही मैं समुद्र की सतह पर तैरते जहाजों और नावों को भी निहार सकता था। एक दोपहर मैंने सोचा कि ग्राउंड फ्लोर पर जाकर होटल की बुकशॉप से कुछ किताबें लेनी चाहिए। जैसे ही मैं नीचे जाने के लिए कमरे से निकला, कॉरिडोर में मैंने दो बुजुर्ग यूरोपियन महिलाओं को ऊहापोह की स्थिति में देखा। उनमें से एक ने मुझसे कहा : ‘एक्सक्यूज मी, क्या आप जानते हैं कि छत पर जाने का रास्ता कहां से है? हम देखना चाहते हैं कि मुंबई का समुद्र तट यहां से कैसा नजर आता है। हमारा कमरा निचले फ्लोर पर है और वहां से केवल फ्लैटों के ब्लॉक ही दिखाई देते हैं।’

मैंने जवाब दिया : ‘मुझे मालूम नहीं छत पर जाने का रास्ता कहां से है, लेकिन आप मेरे कमरे की खिड़की से समुद्र का खूबसूरत नजारा देख सकती हैं।’ मैंने कमरे का दरवाजा खोला और उन महिलाओं को भीतर बुला लिया। उन्होंने जी भरकर समुद्र को निहारा। उसके बाद हम बातें करने लगे। मैंने उनसे पूछा : ‘आप कहां से आई हैं?’ उन्होंने जवाब दिया : ‘इंग्लैंड।’ मैंने पूछा : ‘इंग्लैंड में कहां से?’ उन्होंने कहा : ‘हर्टफोर्डशायर से।’ मैंने फिर पूछा : ‘हर्टफोर्डशायर में कहां से?’ उन्होंने जवाब दिया : ‘वेल्विन गार्डन सिटी। क्या आप उसके बारे में जानते हैं?’

मैंने जवाब दिया : ‘न सिर्फ जानता हूं, बल्कि मैं वहां तीन साल रहा भी हूं। उन दिनों मैं लंदन में कानून की पढ़ाई कर रहा था।’ अब उन महिलाओं ने मुझसे पूछा : ‘क्या आप वहां डेलकॉट टेनिस क्लब के सदस्य थे?’ मैंने कहा : ‘जी हां। वास्तव में गर्मियों के दौरान मेरी अधिकांश शामें डेलकॉट टेनिस क्लब में ही गुजरती थीं।’ अब हैरान होने की बारी उन महिलाओं की थी। उन्होंने मुझसे पूछा : ‘क्या आप मिस्टर सिंह हैं?’

मैंने आश्चर्यचकित होकर जवाब दिया : ‘हां, मैं खुशवंत सिंह हूं, लेकिन आपको कैसे पता?’ उनमें से एक महिला ने कहा : ‘शायद आपको अब याद नहीं, लेकिन मैंने कई बार आपके साथ टेनिस खेला है!’

मैं इस घटना को कभी भुला नहीं पाया। यह महज एक इत्तफाक ही नहीं था। यह इत्तफाक से भी कहीं ज्यादा था। इतने सालों बाद उस महिला से मेरी भेंट हुई थी। वह उसी होटल में ठहरी थी, जहां मैं ठहरा था। वह उसी कॉरिडोर में टहल रही थी, जहां से होकर मैं नीचे की ओर जाने वाला था। हमारी मुलाकात हुई, हमने बातें की और आखिरकार हमने एक-दूसरे को पहचान लिया। जब कभी इस तरह के इत्तेफाकों से हमारा सामना होता है तो हमें महसूस होता है कि कोई न कोई अज्ञात ताकत ऐसी है, जो हमें बार-बार यह अहसास कराती है कि ज्ञात घटनाओं के पीछे भी कुछ अज्ञात कारण होते हैं। वे कारण हमें ऊपर से नजर नहीं आते, लेकिन वास्तव में घटनाएं कहीं न कहीं आपस में जुड़ी होती हैं।
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कवि उत्पल दत्त
अगस्त 1993 में जब उत्पल दत्त की मृत्यु हुई, तब वे 64 वर्ष के थे। उन्होंने फिल्म जगत में एक अभिनेता, निर्देशक और संगीतकार के रूप में ख्याति अर्जित की थी। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कविताएं भी लिखते थे। उनकी मृत्यु के बाद उनके करीबी मित्रों ने उनकी कुछ कविताओं का बांग्ला से अंग्रेजी में अनुवाद किया। ये अनुवाद सबसे पहले वर्ष 1996 में छपे। बांग्ला में उनकी कविताओं के संकलन का शीर्षक था : दिन बदलेर कोबिता। शंकर सेन द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद का शीर्षक था : पोएट्री ऑफ चेंजिंग टाइम्स। मैंने इस संकलन से यह कविता चुनी है, जो अपने शहर से बेहद प्यार करने वाले व्यक्तियों की भावनाओं को प्रदर्शित करती है।
कविता का शीर्षक है : ‘कोलकाता का गीत : एक’
मेरे प्यारे शहर पर लगाए जाएंगे
और कितने इल्जाम?
कब तक पुकारा जाएगा उसे
बदनुमा गलियों की बस्ती?
मेरे शहर के कपड़ों पर लगे हैं धब्बे
मैली हो चुकी हैं आस्तीनें उसकी।
कुछ ने कहा यह सौदागरों का शहर है
कुछ ने कहा दुस्वप्नों का शहर।
लेकिन मैं देख सकता हूं
इस शहर का एक उदास चेहरा।
वह मेरी रातों का पनाहगाह है
और मेरे दिनों की रोशनी।
यह शहर पोंछ देता है
मेरे माथे का पसीना
अपने सतर्क हाथों से।
मैं प्यार करता हूं मेरे शहर
मेरे कोलकाता से।
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पीने का सलीका
बंता ने संता से कहा : मेरे दादाजी 96 साल के हो गए थे, फिर भी उन्होंने कभी ग्लासेस (चश्मे) का इस्तेमाल नहीं किया।
संता ने जवाब दिया : मैं जानता हूं वे ग्लासेस (गिलास) का इस्तेमाल क्यों नहीं करते थे, क्योंकि वे सीधे बोतल से ही शराब पीने में विश्वास रखते थे!
(सौजन्य : जेपी सिंह काका, भोपाल)

खुशवंत सिंह
लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।