Sunday, May 8, 2011

बेवजह बचाव की मुद्रा में है कांग्रेस!

कट्टरपंथी हिंदू संगठनों द्वारा फैलाए जाने वाले धार्मिक तनाव को लेकर राहुल गांधी द्वारा की गई टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खेमों में बवाल मचने को एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया माना जाना चाहिए। पर अपने युवा महासचिव की अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर के साथ हुई बातचीत को लेकर कांग्रेस पार्टी जिस तरह से बचाव की मुद्रा में आ गई और अपने आप को शर्मिंदगी से बचाने के लिए जिस तत्परता से पार्टी ने राहुल गांधी की ओर से नया बयान जारी किया, वह कहीं ज्यादा चौंकाने वाला है।

देश के हिंदू संगठनों को लेकर कांग्रेस के ज्ञात विचारों के संबंध में देश में किसी तरह की भ्रम की स्थिति नहीं है। और न ही हिंदू संगठन भी कांग्रेस के इस विचार के प्रति कोई दुविधा व्यक्त करना चाहेंगे कि हर प्रकार का आतंकवाद और सांप्रदायिकता भारत के लिए खतरा है। कांग्रेस महासचिव पूर्व में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना सिमी के साथ कर चुके हैं और इस संबंध में उनकी पार्टी ने राहुल के बयान के संबंध में कभी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जैसा कि विकीलीक्स वेबसाइट द्वारा दस्तावेजों के जारी होने के बाद किया गया है। विकीलीक्स द्वारा केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम सहित देश के अन्य नेताओं और अधिकारियों को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं पर सरकार अथवा कांग्रेस पार्टी द्वारा उनके संबंध में कोई सफाई नहीं दी गई है।

कोई आश्चर्य नहीं कि भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार की रुचि भी लड़ाई को केवल राहुल गांधी तक ही सीमित रखने की है। कारण भी स्पष्ट है कि विपक्षी दलों के लिए दूरसंचार घोटाले और राडिया टेप से उजागर हो रही जानकारियों से घिरे सत्तारूढ़ गठबंधन पर आगामी चुनावों तक दबाव बनाए रखने के लिए राहुल गांधी को ही निशाने पर रखना जरूरी है। और ऐसा राहुल गांधी और कांग्रेस को हिंदू-हितों का विरोधी करार देकर ही किया जा सकता है। आतंकवाद को जब रंगों में बांटा जाएगा तो फिर चुनावी राजनीति का भी अयोध्या और आजमगढ़ के बीच ध्रुवीकरण होने ही लगेगा। अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन के सम्मान में प्रधानमंत्री द्वारा दी गई दावत के दौरान बातचीत में अमेरिकी राजदूत के सवाल को राहुल गांधी अगर चाहते तो मनमोहन सिंह के अंदाज में टाल भी सकते थे। पर चूंकि संवेदनशील मुद्दों पर अपने मंतव्य किसी विदेशी राजनयिक के समक्ष इस तरह से जाहिर करने के मामले में कांग्रेस महासचिव को डॉ.मनमोहन सिंह जैसा निर्मम बनने में अभी वक्त लग जाएगा, विपक्षी दलों के लिए वे ऐसे ही सॉफ्ट टारगेट बनते रहेंगे और वे इसके लिए अपने आपको प्रस्तुत भी कर रहे हैं। यह मुद्दा अलग है कि कांग्रेस पार्टी में यथास्थितिवाद को कायम रखने का हामी खेमा अपने युवा महासचिव की राजनीति के साथ चाहे जितनी असहमति रखना चाहे, उनके कथन के बचाव में बयान जारी करते रहना या स्पष्टीकरण देते रहना उसकी अनुशासनात्मक मजबूरी बनी रहेगी। कांग्रेस पार्टी अपने इस वैचारिक द्वंद्व से बाहर नहीं निकल पाई है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित अन्य हिंदू संगठनों के प्रति उसका वास्तविक एजेंडा क्या होना चाहिए। स्पष्ट है कि श्रीमती सोनिया गांधी की छवि के आसपास जिस कद और काठी के कांग्रेसी नेताओं का जमावड़ा नजर आता है, उनमें से अधिकांश राहुल गांधी की फ्रेम से बाहर पाए जाते हैं। कार्यसमिति के सदस्यों का चयन चुनावों के जरिए हो या अध्यक्ष द्वारा मनोनयन से, पार्टी के आंतरिक द्वंद्व का केवल एक उदाहरण है। इस द्वंद्व के चलते इस हकीकत पर भी गौर किया जा सकता है कि पार्टी देश के अधिकांश राज्यों में सत्ता से बाहर है और बिहार के बाद आगामी वर्षो में होने वाले अन्य चुनावों को लेकर किसी तरह का सट्टा भी उसके पक्ष में हाल-फिलहाल तो नहीं लगाया जा सकता। कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग चूंकि राहुल गांधी को देश के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है, यह जरूरी है कि पार्टी अपने ही द्वारा बुनी गई भूल-भूलैया से बाहर आए। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने अपने इर्द-गिर्द जो तिलिस्म खड़ा कर लिया है वह कम से कम बाहर से तो विकीलीक्स के खुलासों से ज्यादा सनसनीखेज नजर आता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नए साल की पूर्व संध्या पर आयोजित हो रहे कांग्रेस के राष्ट्रीय महाधिवेशन के बाद यह तिलिस्म टूटेगा और शीर्ष पार्टी नेतृत्व एक ही फोटो फ्रेम में नजर आने लगेगा। क्योंकि आत्मविश्वासपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में उजागर होने वाले गोपनीय दस्तावेज किस तरह के वार्तालापों को उगलने वाले हैं और किस-किस को वे अपना शिकार बनाएंगे।

राष्ट्रीय संकट और राग दरबारी

कपिल सिब्बल का दावा है कि सरकारी खजाने को वास्तविकता में कोई घाटा नहीं हुआ। एक ऐसी संवैधानिक संस्था जिसकी रिपोर्ट्स की वैधता और विश्वसनीयता को लेकर अतीत में कभी संदेह नहीं व्यक्त किए गए, उसे एक झटके में केवल इसलिए दांव पर लगा दिया गया कि इस समय प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत निष्ठा और सरकार का अस्तित्व दांव पर लगा है।

जिस तरह की अस्थिरता का माहौल इस समय देश में व्याप्त है, पहले कभी नहीं रहा। देश एक अहिंसक अराजकता के दौर में प्रवेश करने की तैयारी करता दीख रहा है। संसद का समूचा सत्र विपक्ष की इस मांग और सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा उसे किसी भी कीमत पर नहीं स्वीकार करने की भेंट चढ़ चुका है कि दूरसंचार घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया जाए। दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जिद पर इस हद तक अड़े हुए हैं कि आगामी बजट सत्र का क्या हश्र होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। विपक्ष निश्चित ही इसका ठीकरा सत्तारूढ़ गठबंधन पर और यूपीए उसे भाजपा, उसके सहयोगी दलों तथा वामपंथियों के सिर पर फोड़ेगा।

ऐसा तो पहले भी हुआ है कि देश में गहरा राजनीतिक संकट उत्पन्न हो गया हो या राष्ट्र को किसी आर्थिक अस्थिरता का सामना करना पड़ा हो। 1974 के बिहार आंदोलन और फिर 1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसले के बाद उत्पन्न हुआ राजनीतिक संकट और उसके कोई डेढ़ दशक बाद चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्व काल में विदेशी मुद्रा की स्थिति को लेकर उत्पन्न हुई आर्थिक परिस्थितियां उदाहरण के तौर पर गिनाए जा सकते हैं। दोनों ही तरह की परिस्थितियों का देश ने सामना भी किया और सफलतापूर्वक उससे बाहर भी आया। उसका बुनियादी कारण यही रहा कि तब आम आदमी देश की चिंताओं को अपनी चिंता मानता था।

वर्तमान की इस खतरनाक स्थिति की ओर किसी का ध्यान नहीं है कि संसद के अस्तित्व में होने या नहीं होने के प्रति जनता को संवेदनाशून्य बनाया जा रहा है। जनता को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है कि देश की सर्वोच्च संवैधानिक व प्रतिनिधि संस्था इस तरह से ठप पड़ी है कि जैसे उसकी जरूरत ही खत्म हो गई है या कि उसके बिना भी काम चल सकता है। कल को विधानसभाओं और स्थानीय निकायों को लेकर भी ऐसी ही स्थितियां बन सकती हैं। लड़ाई इस तरह की छिड़ी है कि संवैधानिक संस्थाओं की शामत बन आई है, उनकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं, उनसे संबद्ध लोगों के चाल-चलन और प्रतिबद्धताओं को संदेह के घेरे में लाया जा रहा है और किसी भी स्तर पर विरोध या चिंता के स्वर प्रकट नहीं हो रहे हैं। सलाहकारों और दरबारियों की जमात निर्वस्त्र राजा के भी शानदार परिधानोंे से सुसज्जित होने का दावा करने में जुटी है और प्रजा को महंगाई और भ्रष्टाचार की ठंड में ठिठुरने के लिए सड़कों पर ठेला जा रहा है।

संवैधानिक संस्थाओं की वैधता को सार्वजनिक रूप से चुनौती देने और उनके निर्णयों को कठघरों में खड़ा कर उन्हें शर्मिदा करने के सिलसिले को रोका जाना इसलिए जरूरी है कि बारह से बीस रुपए के बीच की आमदनी पर बसर करने वाली देश की कोई चालीस करोड़ जनता के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंचने के वैधानिक रास्ते ये ही हैं। बिनायक सेन मामले में रायपुर (छत्तीसगढ़) की जिला अदालत द्वारा दिए गए फैसले को लेकर जिस तरह की नाराजगी और आलोचना का प्रदर्शन किया जा रहा है, वह लगभग उसी तरह का है जैसा कि शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के बाद संबंधित न्यायाधीशों के खिलाफ आक्रोश सड़कों पर व्यक्त हुआ था। ‘धार्मिक कट्टरवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष कट्टरवाद’ में शायद कोई फर्क नहीं रह गया है। तथाकथित ‘सेकुलरिज्म’ भी एक तरह के ‘कट्टरवाद’ में तब्दील होकर संवैधानिक संस्थाओं को वैसे ही जलील और अपमानित करने में जुट जाना चाहता है जैसे धार्मिक कट्टरवादी करते हैं। बोफोर्स तोपों की खरीद में दी गई कथित दलाली को लेकर आयकर अपीलीय अधिकरण की व्यवस्था पर जिस आशय की शंकाएं राजनीतिक स्तरों पर व्यक्त की गईं और उसके निर्णय को संदेह के घेरे में लाया गया है, व्यवस्था के खंभों को कमजोर करने की दिशा में यह एक और कदम है।

2जी स्पेक्ट्रम आवंटन मामले में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट को लेकर केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल के नेतृत्व में कांग्रेस ने जो आक्रामक रवैया अपनाया है वह और भी हैरान करने वाला है। समझ से बाहर है कि कौन किसे बचाना चाहता है और असली अपराधी कौन है! नीरा राडिया का प्रकरण अब कहां है, कौन बताएगा? बातचीत के पांच हजार आठ सौ टेप्स में से केवल कुछ चुने हुए ही क्यों जाहिर हुए? बाकी का क्या हुआ? किससे पूछा जाए?

कैग की ‘77 पृष्ठों’ की रिपोर्ट संसद में 16 नवंबर को संसद के पटल पर रखी गई थी। (सरकार को तो रिपोर्ट 10 नवंबर को ही सौंप दी गई थी)। बताने की जरूरत नहीं कि रिपोर्ट में स्पेक्ट्रम घोटाले के कारण सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए के नुकसान की बात कही गई थी। पूरे घोटाले में ए राजा की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए थे। यही वह समय था, जब देश राडिया टेप्स की गिरफ्त में था और नीरा राडिया, ए राजा तथा मीडिया से संबद्ध बड़े-बड़े नामों की भूमिका को लेकर बहसें चल रही थीं और लानतें भेजी जा रही थीं। रिपोर्ट पेश होने के लगभग दो महीने बाद दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने कैग के उन तमाम निष्कर्षो को निराधार, गलतियों से भरा एवं महज अनुमानों के आधार पर गढ़ा हुआ बता दिया, जिनका जवाब देने के लिए प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने व्यक्तिगत तौर पर संसद की लोकलेखा समिति के समक्ष प्रस्तुत होने का प्रस्ताव किया था। श्री सिब्बल का दावा है कि सरकारी खजाने को वास्तविकता में कोई घाटा नहीं हुआ। एक ऐसी संवैधानिक संस्था जिसकी रिपोर्ट्स की वैधता और विश्वसनीयता को लेकर अतीत में कभी संदेह नहीं व्यक्त किए गए, उसे एक झटके में केवल इसलिए दांव पर लगा दिया गया कि इस समय प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत निष्ठा और सरकार का अस्तित्व दांव पर लगा है।

पूछा जाना चाहिए कि अगर कोई घोटाला हुआ ही नहीं है तो क्यों ए राजा को त्यागपत्र देना पड़ा, क्यों उनके ठिकानों पर छापे पड़ने चाहिए थे और क्यों प्रधानमंत्री को लोकलेखा समिति के समक्ष पेश होने का प्रस्ताव करना चाहिए? और अगर कैग की रिपोर्ट का कोई मतलब ही नहीं है तो फिर पूरे मामले की जांच क्यों लोक लेखा समिति को करनी चाहिए और क्योंकर संयुक्त संसदीय समिति गठित की जानी चाहिए?

सरकार इस समय बदहवास नजर आती है क्योंकि उसे एक साथ कई मोर्चो पर न सिर्फ लड़ाई लड़नी पड़ रही है, बल्कि उसके सैनिक भी विभाजित और अलग-अलग उद्देश्यों के लिए भटकते नजर आ रहे हैं। जनता भौंचक्की है कि उसे क्या करना चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं की साख को कमजोर करने वाले कार्यक्रमों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन के परिजनों से संबंधित आरोपों और मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस से जुड़े विवादों पर अलग से चर्चा की जा सकती है। वर्ष 2010 की विशेषताओं के बारे में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर साल सबसे ज्यादा निराशाजनक ढंग से खत्म हुआ ही है पर 2011 की शुरुआत भी कोई आशाजनक तरीके से नहीं हुई है।

न्यायिक सक्रियता के निहितार्थ

ऐसा महसूस हो रहा है कि देश को इस समय कोई जनता के द्वारा चुनी गई सरकार नहीं बल्कि न्यायपालिका चला रही है। सरकार नाम की कोई ताकत सत्ता में है और देश का कामकाज भी निपटा रही है ऐसा लगना काफी पहले से बंद हो चुका है। ऐसा महसूस होने देने के पीछे भी सरकार का ही हाथ है। जनता देख रही है कि देश की सेहत से जुड़े अहम मामलों पर फैसले करने अथवा सलाह देने का काम न्यायपालिका के हवाले हो गया है और सरकार अदालती कठघरों में खड़ी सफाई देती हुई ही नजर आती है। संसद ठप-सी पड़ी है और सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता बढ़ गई है। बहस का विषय हो सकता है कि क्या यह स्थिति किसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित और फायदेमंद है। ऐसा कौन सा मुद्दा है जो आज सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर फैसले के लिए गुहार नहीं लगा रहा है? और सवाल यह भी है कि इन मुद्दों में कौन-सा ऐसा है जिस पर सरकार स्वयं कोई न्यायोचित फैसला नहीं ले सकती है? एक वक्त था जब बहस इस बात पर चलती थी संसद की सत्ता सर्वोच्च है या न्यायपालिका की?

केशवानंद भारती केस में न्यायपालिका की व्यवस्था के बाद सालों साल इस पर बहस भी चली। संसद और न्यायपालिका के बीच अधिकार-क्षेत्र को लेकर कई बार टकराव की स्थितियां भी बनीं। पर आज के हालात देखकर लगता है कि न तो सरकार ही और न ही जनता के चुने हुए प्रतिनिधि ही इतनी दयनीय स्थिति में पहले कभी देखे गए। ऐसे हालात तभी बनते हैं जब सरकार का अपनी ही संस्थाओं पर नियंत्रण खत्म होता जाता है या फिर उसका अपनी जनता पर से भरोसा उठ जाता है। सत्ता में काबिज लोगों को ऐसा आत्मविश्वास होने लगता है कि सबकुछ ठीकठाक चल रहा है और स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है। न तो कोई अव्यवस्था है और न ही कोई भ्रष्टाचार, विपक्षी दलों द्वारा जनता को जान-बूझकर गुमराह किया जा रहा है। दूरसंचार घोटाले पर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट को लेकर कपिल सिब्बल जैसे जिम्मेदार केंद्रीय मंत्री द्वारा किया गया दावा और उस पर न्यायपालिका सहित देशभर में हुई प्रतिक्रिया इसका केवल एक उदाहरण है। विभिन्न मुद्दों पर सरकार द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया ठीक उसी प्रकार से है जैसे भयाक्रांत सेनाएं मैदान छोड़ने से पहले सारे महत्वपूर्ण ठिकानों को ध्वस्त करने लगती हैं।

आश्चर्यजनक नहीं कि एक अंग्रेजी समाचार पत्र द्वारा वर्ष 2011 के लिए देश के सर्वशक्तिमान सौ लोगों की जो सूची प्रकाशित की गई है उसमें पहले स्थान पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएच कापड़िया को रखा गया है। दूसरा स्थान कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को और तीसरा एक सौ बीस करोड़ की आबादी वाले देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को प्रदान किया गया है। इस क्रम पर अचंभा भी व्यक्त किया जा सकता है और जिज्ञासा भी प्रकट की जा सकती है। बताया गया है कि मुख्य न्यायाधीश के रूप में श्री कापड़िया आज सुप्रीम कोर्ट की ताकत का प्रतिनिधित्व करते हैं। एक ऐसे वक्त जब राजनीति का निर्धारण न्यायपालिका के फैसलों/टिप्पणियों से हो रहा है, नंबर वन न्यायाधीश और उनकी कोर्ट देश का सबसे महत्वपूर्ण पंच बन गई है। अयोध्या मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित फैसले को लेकर जब राजनीति की सांसें ऊपर-नीचे हो रही थीं, बहसें सुनने के बाद उन्होंने यह निर्णय देने में एक मिनट से कम का समय लगाया कि हिंसा फैलने की आशंकाओं को बहाना नहीं बनने दिया जाना चाहिए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय को अपना फैसला सुनाना चाहिए।

चिंता का मुद्दा यहीं तक सीमित नहीं है कि राष्ट्रमंडल खेलों में सरकार की नाक के ठीक नीचे हुए भ्रष्टाचार से लेकर विदेशों में जमा काले धन की वापसी के सवाल तक पिछले महीनों के दौरान जितने भी विषय उजागर हुए उन सबमें सच्चाई सामने आने की संभावनाएं न्यायपालिका के हस्तक्षेप के बाद ही प्रकट हुईं और ऐसा कोई आश्वासन नहीं है कि जो सिलसिला चल रहा है वह कहीं पहुंचकर रुक जाएगा।

क्या ऐसी आशंका को पूर्णत: निरस्त किया जा सकता है कि लगातार दबाव में घिरती हुई कार्यपालिका किसी मुकाम पर पहुंचकर न्यायपालिका के फैसलों को चुनौती देने, उन्हें बदल देने या उन पर अमल को टालने की गलियां तलाश करने लगे। या फिर न्यायपालिका पर राजनीतिक आरोप लगाए जाने लगें कि वह शासन के कामकाज में हस्तक्षेप करते हुए अग्रसक्रिय (प्रोएक्टिव) होने का प्रयास कर रही है, टकराव की स्थिति इससे भी आगे जा सकती है। ऐसा अतीत में हो चुका है।

अक्टूबर 2009 में जब इटली की 15 सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने व्यवस्था दी कि वहां की संसद द्वारा पूर्व में पारित कानून, जिससे प्रधानमंत्री को उनके खिलाफ चलाए जाने वाले मुकदमों के प्रति सुरक्षा (इम्यूनिटी) प्राप्त होती है असंवैधानिक है तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे सिल्वियो बलरूस्कोनी ने निर्णय को यह कहते हुए चुनौती दे दी कि संवैधानिक पीठ पर वामपंथी जजों का आधिपत्य है। उन्होंने कहा कि ‘कुछ नहीं होगा, हम ऐसे ही चलेंगे।’ उन्होंने कोर्ट को ऐसी राजनीतिक संस्था निरूपित किया, जिसकी पीठ पर 11 वामपंथी जज बने हुए हैं।

न्यायपालिका की संवैधानिक व्यवस्थाओं को तानाशाही तरीकों से चुनौती देने की स्थितियां और कार्यपालिका के कमजोर दिखाई देते हुए हरेक फैसले के लिए न्यायपालिका के सामने लगातार पेश होते रहने की अवस्था के बीच ज्यादा फर्क नहीं है। एक स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं। चूंकि इस समय देश का पूरा ध्यान सरकार व न्यायपालिका के बीच चल रहे संवाद व अदालती व्यवस्थाओं पर केंद्रित है, विपक्ष की इस भूमिका को लेकर कोई सवाल नहीं खड़े कर रहा है कि कार्यपालिका को कमजोर करने में भागीदारी का ठीकरा उसके सिर पर भी फूटना चाहिए। जो असंगठित और कमजोर विपक्ष न्यायपालिका की ताकत को ही अपनी ताकत समझकर आज सरकार के सामने इतना इतरा रहा है वह स्वयं भी कभी आगे चलकर इसी तरह के टकरावों की स्थितियों का शिकार हो सकता है। यह मान लेना काफी दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि देश का राजनीतिक विपक्ष न्यायपालिका के फैसलों और टिप्पणियों में ही अपने लिए शिलाजीत की तलाश कर रहा है।

खेल खतम, पैसा हजम

शंका-कुशंकाओं और आधी-अधूरी तैयारियों के साये में प्रारंभ हुआ राष्ट्रमंडल खेलों का तमाशा गुरुवार को रंगारंग तरीके से समाप्त हो गया। शुक्रवार से नई दिल्ली की आत्मा अपने पुराने शरीर में फिर से प्रवेश भी कर जाएगी और उसकी चाल-ढाल भी पहले जैसी हो जाएगी।

खेलों के सफलतापूर्वक आयोजन को लेकर श्रेय की दावेदारी का संघर्ष प्रारंभ हो चुका है, जो आगे कई दिनों तक चलेगा। आरोपों-प्रत्यारोपों के गंदे अंतर्वस्त्रों की सार्वजनिक रूप से धुलाई भी होगी ही और उन्हें टांगने के लिए राजनीतिक खूंटियों की तलाश भी की जाएगी।

सवाल फिर भी अनुत्तरित रह जाएगा कि पैंतीस हजार करोड़ रुपए या उससे भी कहीं कई गुना ज्यादा की राशि का जो प्रदर्शन नई दिल्ली में हुआ है, उसकी तहों में छुपे भ्रष्टाचार की खाल उधेड़ने का काम कोई करेगा या नहीं? या फिर सब कुछ जुबानी जमा-खर्च से ही बराबर हो जाएगा?

ऊपर से चलने वाला एक रुपया देश के गांवों में नीचे पहुंचते-पहुंचते कितने पैसे का रह जाता है उसे लेकर स्व. राजीव गांधी ने सबसे पहले कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में अपनी चिंता जताई थी। दो दशकों के बाद राहुल गांधी भी उसी की चर्चा कर रहे हैं।

स्थितियों के फर्क की बातचीत करें तो राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर हुआ सारा भ्रष्टाचार ठीक सत्ता की नाक के नीचे नई दिल्ली में हुआ है। कोई गारंटी नहीं कि इस आदमकद भ्रष्टाचार को लेकर सत्ता के गलियारों में कोई जूं भी रेंगने वाली है।

बहुत मुमकिन है देश की इज्जत के नाम पर सब कुछ जायज करार दिया जाए। पदकों की चमक-दमक के पीछे हर तरह के अपराध और भ्रष्टाचार की कालिख छुपा दी जाएगी। इज्जत के नाम पर जब देश में निरपराध लोगों की हत्याएं भी बर्दाश्त कर ली जाती हों, पैसों का भ्रष्टाचार तो मामूली बात है। सफलताओं के जश्न के दौरान इस तरह की चर्चाएं करना भी एक अपशगुन माना जाता है।

राष्ट्रमंडल खेलों के समारोह स्थल जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के समीप बनने वाले फुट ओवरब्रिज के गिर जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था : ‘इस देश में काम पूरा हुए बिना भुगतान कर दिया जाता है। नया ब्रिज ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

(खेलों के आयोजन में) सत्तर हजार करोड़ रुपए शामिल हैं। देश में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार व्याप्त है। हम आंखें मूंद कर नहीं रह सकते।’ पर इस समय बहस में भ्रष्टाचार नहीं, खेलों की सफलता को लेकर दावेदारियां हैं। दिल्ली के उप राज्यपाल तेजेन्द्र खन्ना ने प्रधानमंत्री से शिकायत की है कि खेल गांव के सफाई इंतजामों को लेकर सारा श्रेय मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ले रही हैं, जो कि गलत है।

श्री खन्ना ने ही इसके पहले कहा था कि खेलगांव में साफ-सफाई व रखरखाव की जिम्मेवारी आयोजन समिति की है। कोई भी इस समय यह चर्चा नहीं करना चाहता कि करोड़ों की लागत से बनने वाले फुट ओवरब्रिज के गिर जाने के बाद सेना के जवानों ने किस तरह से केवल तीन दिनों में आधी से कम लागत में उसे तैयार कर पांचवें दिन आयोजन समिति को सौंप दिया था। राष्ट्रमंडल खेल अगर किसी एक कारण से भी विफल हो जाते तो उसकी जिम्मेदारी लेने के लिए भी शायद टेंडर जारी करना पड़ते।

इस मुद्दे पर तो शायद अब कोई बहस भी नहीं छेड़ना चाहेगा कि पैंतीस या सत्तर हजार करोड़ रुपए देश के कितने गांवों की तकदीर बदल सकते थे? कितने स्कूल या कितनी सड़कें बना सकते थे? कितनी महिलाओं को कितनी दूरी से पीने का पानी ढोकर लाने की जिल्लत से निजात दिला सकते थे? या कितने किसानों को आत्महत्या करने से रोक सकते थे?

देश को कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए अगर आने वाले वर्षो में हम सुरेश कलमाडी और ललित मोदी के कई क्लोन तैयार करने में सफल हो जाएं और ये ही लोग सफलता के प्रतीक पुरुष बन जाएं। ओलिंपिक खेलों की मेजबानी करने के हौसले अब वैसे ही बुलंद हो गए हैं।

राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन को लेकर चलने वाली तैयारियों के दौरान जिस तरह की शर्म का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को सामना करना पड़ा और प्रधानमंत्री को जिस तरह व्यक्तिगत रूप से अपनी निजी क्षमता को दांव पर लगाकर हस्तक्षेप करना पड़ा,

अगर उसे भी भ्रष्टाचार की तरह ही हजम नहीं करना चाहें तो सीखने के लिए ऐसा बहुत कुछ हाथ लगा है, जो देश में खेलों और खिलाड़ियों का भविष्य संवार सकता है। पर हम जानते हैं ऐसा होगा नहीं। खेल संगठनों पर कब्जा जमाए हुए बूढ़े राजनीतिज्ञ और भ्रष्ट नौकरशाह ऐसा संभव होने नहीं देंगे।

देश के खेल संगठन और उनके मार्फत मिलने वाला सुख राजभवनों के आनंद से कम नहीं है। राजभवनों में स्थापना के लिए जिस तरह के व्यक्तित्वों की आमतौर पर तलाश की जाती है, वे कोई अप्रतिम नहीं होते। राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के दौरान मचे घमासान को हम अपने राष्ट्रीय मिजाज से अलग करके नहीं देख सकते।

आखिरी वक्त में/ तक सारी तैयारियों में जुटे रहना और फिर उसके लिए हर तरह की बाधा दौड़ ‘किसी भी कीमत पर’ जीतने का जज्बा ही हमारा सबसे बड़ा आपदा प्रबंधन है और हम उस पर व्यक्तिगत से लगाकर राष्ट्रीय स्तर तक गर्व करने में संकोच नहीं करते।

देश में कुछ सुगबुगाहट जरूर है कि चीजें बदलने का नाम लेने लगी हैं। बताया जा रहा है कि आने वाले वर्षो में राजनीति में नेतृत्व का हस्तांतरण युवाओं के हक में होने जा रहा है। कुछ नए और ईमानदार चेहरे देश की नई इबारत लिखने जा रहे हैं। जैसा कि खेलों के दौरान देखा गया।

छुपे हुए और गुमनाम चेहरों ने अंधेरों से निकलकर पदकों का आकाश चूम लिया और अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों को राष्ट्र के सामूहिक गौरव में तब्दील कर दिया। अगर ऐसा होता है तो उम्मीद की जा सकती है कि खेलों और उनकी तैयारियों की तस्वीर भी बदलेगी।

पर तब तक के लिए हम इस पदक तालिका के साथ तरक्की की ओर आगे बढ़ते रह सकते हैं कि राष्ट्रमंडल के सभी देशों के बीच औसत से कम वजन के बच्चों की संख्या के मामले में भारत सबसे ऊपर है।

बच्चों के अधिकारों से जुड़ी एक स्वयंसेवी संस्था की रिपोर्ट में किया गया खुलासा चौंकाने वाला हो सकता है कि भारत में 43 प्रतिशत बच्चे औसत से कम वजन के हैं। खेलों की तैयारियों से जुड़े असली मानकों की ओर तो वास्तव में किसी का ध्यान ही नहीं है। जिस तरफ ध्यान है वह यह कि : खेल खतम, पैसा हजम! - लेखक भास्कर के समूह संपादक हैं।

देशकाल

देशकाल . एक जमाना था जब रेलगाड़ियों के वातानुकूलित या अन्य आरक्षित डिब्बों में या फिर हवाई अड्डों पर ढेर सारे परिचित चेहरे मिल जाते थे। साफ-सुथरे वस्त्रों में सजे-धजे इन लोगों के चेहरों पर मुस्कराहटें और बदन पर इत्र की ऐसी खुशबू तैरती रहती थी जो समूची यात्रा के दौरान बनी रहती थी।

ऐसा लगता था सभी लोग सीधे स्नानागारों से निकलकर रेलवे स्टेशन या हवाई अड्डों पर पहुंच गए हैं। कहीं कोई तनाव नजर नहीं आता था। किसी को भी कहीं पहुंचने की कोई जल्दी नहीं होती थी। स्टेशन भी परिचित ठिकानों की तरह ही नजर आते थे।

और फिर हवाई अड्डों पर तो तब कोई खास भीड़ भी नहीं होती थी। इसी सब के चलते बहुतेरे लोगों ने आखिरी वक्त पर ट्रेनें और हवाई जहाज पकड़ने की आदतों के साथ रिश्ते कायम कर लिए थे।

पर पता ही नहीं चल पाया और पलकें झपकते ही सब कुछ अचानक बदलने लगा। न तो रेलवे स्टेशन और न ही हवाई अड्डे पहले जैसे रहे और न ही यात्रा करने वाले चेहरे। किसी समय चहलकदमी करते ट्रेनों पर सवार होने वाले या हर एक स्टेशन पर उतरकर डिब्बों में अपने परिचितों को ढूंढ़ने वाले लोगों की जगह थकी-मांदी और बेसब्र भीड़ ने ले ली है।

एक-दूसरे को धक्के मारते हुए कैसे आगे बढ़ा जाए, हर तरह की यात्रा का मूल मंत्र हो गया है। हर एक ट्रेन अपनी सुरक्षा के प्रति आशंकित विस्थापितों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोकर ले जाती हुई मशीन जैसी नजर आने लगी है।

हर एक यात्री रात के सफर में बार-बार चौंककर उठने लगा है कि या तो उसका सामान चोरी हो चुका है या फिर उसका स्टेशन पीछे निकल गया है और वह उतर नहीं पाया। अब पूरे डिब्बे में कोई परिचित या तो मिलता ही नहीं। मिलता भी है तो या तो कुछ याद करता या सीट के लिए परेशान।

हवाई अड्डे भी थके-मांदे और परेशान लोगों की भीड़ के ‘अड्डों’ में तब्दील होते जा रहे हैं। परिचित चेहरों और मुस्कराहटों की जगह या तो सस्ती दरों वाली हवाई सेवाओं द्वारा तैयार किए गए नए उपभोक्ता वर्ग ने ले ली है या फिर एक हाथ में मोबाइल और दूसरे में लैपटॉप संभाले टाई छाप कॉपरेरेट कल्चर ने।

पहले लोग कम होते थे और खिलखिलाहटें और आवाजें ज्यादा, पर अब केवल भीड़ होती है जो बसंत के मौसम में भी सन्नाटा ओढ़े रहती है। बोर्डिग पास लेनेके लिए लगने वाली कतारें देखते ही देखते सुरक्षा जांच के तनाव और फिर ‘विमान में सबसे पहले कैसे चढ़कर अपना सामान जमा लें’ की आपाधापी में परिवर्तित हो जाती हैं।

ट्रेनों में भी मोबाइल और लैपटॉप के चार्ज करने के पाइंट्स की तलाश की जाती है और हवाई अड्डों पर भी। एक-दूसरे को आत्मीयता और अपनेपन से चार्ज करने के आनंदवन तनावों और अवसादों के रेगिस्तानों में बदल गए हैं। एक वक्त था जब बीमारों के इलाज के लिए महानगरों में ले जाने के लिए हवाई जहाजों के इस्तेमाल की सलाह दी जाती थी, अब ऐसा लगता है कि बीमारों से भरे जहाजों को इलाज के लिए कहीं ले जाया जा रहा है।

तने हुए चेहरों के छोटे-छोटे कई गांव जैसे आकाश में एक साथ प्रतियोगिता करते हुए उड़ रहे हों। एक-दूसरे से आगे निकलने की प्रतियोगिता। ऐसा कुछ प्राप्त करने की प्रतियोगिता जिसे व्यक्त नहीं किया जा सके। पहले रेलगाड़ियों के विलंब से आने-जाने को लेकर भी ज्यादा खीझ नहीं होती थी, अब हवाई जहाजों के विलंब से उड़ने या किसी उड़ान के रद्द हो जाने की पीड़ा भी बर्दाश्त से बाहर हो चली है।

इंसानी संवेदनाएं रेलगाड़ियों के अप-डाउन नंबरों और उड़ानों की संख्या में बदल गई हैं। अब इस तरह की कोई सूचना नहीं मिलती कि कितने लोग मुस्कराते हुए अपने घरों को सकुशल पहुंच गए। अब बताया यह जाता है कि सितंबर में छप्पन हजार से अधिक यात्रियों को उड़ानों के निरस्त हो जाने या उड़ानों में विलंब से परेशानी हुई। प्रगति की नई परिभाषा ने हर एक चीज को आंकड़ों में बदल दिया है।

शहरों की कुल आबादी के मुकाबले मोबाइल सेटों की संख्या ज्यादा हो रही है पर लोगों ने सीधे-मुंह एक-दूसरे से बात करना या तो बंद कर दिया है या कम कर दिया है। एक सर्वेक्षण में बताया गया है कि इंफॉर्मेशन टेक्नालॉजी के क्षेत्र में भारत में कार्यरत दस में से नौ लोग अपनी व्यावसायिक उत्पादकता के लिए ऑफिस जाना जरूरी नहीं समझते।

जिस कॉपरेरेट इंफार्मेशन की उन्हें अपने काम के सिलसिले में जरूरत पड़ती है उसे वे आफिसों के बाहर भी प्राप्त कर सकते हैं। यानी कि देश आधुनिक टेक्नालॉजी के एक ऐसे संसार में प्रवेश कर रहा है जो न सिर्फ ‘वायरलेस’ है, ‘कॉन्टेक्टलेस’ भी है।

मीडिया में काम करने वाले लोगों को एक ही वस्तु के दो अलग-अलग समाजों में विपनी प्रस्तुतीकरण के बारे में ज्ञान दिया जाता है। उन्हें समझाया जाता है कि पित्जा की डिलीवरी देने वाला बॉय जब यूरोप के किसी मकान में दरवाजे पर दस्तक देता है तो अंदर कामचलाऊ रोशनी के बीच जमीन पर पैर लंबे किए और लैपटॉप पर काम करता हुआ एक अकेला इंसान होता है।

उसी पित्जा कंपनी के डिलीवरी बॉय को भारतीय विज्ञापन में एक ऐसे मकान पर दस्तक देते हुए बताया जाता है जहां पूरा परिवार एक साथ बैठा टीवी देख रहा है या गप्पे हांक रहा है। पर यह दृश्य भारत में भी शायद लंबे समय तक नहीं चले।

तरक्की की समूची बहस ही जब ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ पर केंद्रित होती जा रही हो, असली फैमिली तो धीरे-धीरे आदिवासी स्वरूप को ही प्राप्त करने वाली है। भारतीय समाज जो अकेलेपन से हमेशा घबराता और डरता रहा है अब एक ऐसी व्यवस्था को आत्मसात कर रहा है जो अपार भीड़ के बीच भी उसे पूरी तरह से शून्यता का बोध कराने वाली है। और यह सब किसी यौगिक क्रिया या तंत्र-साधना के तहत नहीं हो रहा है। यह जान-बूझकर किए जाने वाला सामूहिक प्रयास है।

जैसे-जैसे भीड़ बढ़ेगी, रेलवे स्टेशनों पर मल्टी-लेयर प्लेटफार्म्स बनेंगे, रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ेगी, हवाई अड्डे लगातार आधुनिक और विस्तारित होते जाएंगे। एक-एक शहर में कई-कई हवाई अड्डे होंगे। और तब विमानों की भीड़ एक-दूसरे के आगे-पीछे वैसे ही दौड़ती नजर आएंगी जैसे अभी आकाश में चिड़ियाओं के झुंड दिखाई देते हैं।

तब चिड़ियाएं उड़ने के लिए कहां जाएंगी? वे तो इंसानों की तरह घोसलों में कैद रहने की आदत नहीं डाल पाएंगी। मुमकिन है प्रगति के जिस सुख की आधुनिक भारत को तलाश है, उसके लिए यह कोई बड़ी कीमत न भी हो। - लेखक दैनिक भास्कर के समूह संपादक हैं।

धन और लक्ष्मी

दीपावली पर धन-संपदा और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, इसलिए मुझे लगा कि हमारे समाज में संपदा की स्थिति पर कुछ बातें कही जानी चाहिए। मैं लक्ष्मी और धन का अंतर भी बताना चाहता हूं। इन दोनों को एक मान लिया जाता है, लेकिन ऐसा है नहीं।

मैं हाल ही की एक घटना से अपनी बात शुरू करना चाहूंगा। पिछले हफ्ते मैं प्रख्यात अमेरिकी निर्देशक ओलिवर स्टोन द्वारा संचालित एक कार्यक्रम में मौजूद था। यह कार्यक्रम मुंबई फिल्म फेस्टिवल में हो रहा था। ओलिवर हॉलीवुड सिनेमा की जीवित किंवदंती हैं और उन्होंने तकरीबन चालीस साल लंबे फिल्मी कॅरियर में विभिन्न विषयों पर फिल्में बनाई हैं।

उनकी एक चर्चित फिल्म है ‘वॉल स्ट्रीट’ (1984), जिसका सीक्वेल हाल ही में रिलीज हुआ है। फिल्म में माइकल डगलस ने गोर्डन गेक्को की भूमिका निभाई थी। एक चालाक, अनैतिक, लेकिन आकर्षक फाइनेंसर। गोर्डन गेक्को अमेरिकी सिने इतिहास के सबसे यादगार चरित्रों में से एक है। फिल्म में गेक्को का यह संवाद बहुत लोकप्रिय हुआ था : ‘ग्रीड इज गुड’ (लालच में बुराई नहीं।)

यह मेरी खुशकिस्मती थी कि मैं ओलिवर से मिला। मैंने उनसे पूछा गोर्डन गेक्को इतना लोकप्रिय क्यों है? ओलिवर ने इसका बहुत सीधा सा जवाब दिया। उन्होंने कहा : ‘गेक्को इसलिए लोकप्रिय है, क्योंकि वह कामयाब और रईस है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि उसके तौर-तरीके अनैतिक हैं, या वह मतलबी और लालची है या बुरा इंसान है। ८क् के दशक में अमेरिकियों का ध्यान भौतिक संपदा पर इतना केंद्रित हो गया था कि उन्हें ‘ग्रीड इज गुड’ जैसे ही किसी जुमले की जरूरत थी, जो उनकी लालसा को न्यायोचित ठहरा सके।’

इस दीपावली पर, जब हम लक्ष्मी की पूजा करेंगे, तब हमें यह आत्ममंथन भी करना चाहिए कि कहीं हम भी तो धीरे-धीरे ऐसे ही नहीं बनते जा रहे हैं? नहीं तो हमारे राजनेता उन्हीं लोगों को क्यों लूटते, जो उन्हें वोट देकर जिताते हैं? क्यों वे अपनी जेबों में सैकड़ों करोड़ रुपए ठूंस लेते हैं,

जबकि संभव है वे इतना पैसा अपने जीवनकाल में खर्च भी न कर पाएं? आखिर क्यों सेना का कोई जनरल उस फ्लैट को हजम कर जाना चाहता है, जो किसी सैनिक की विधवा के लिए था? आखिर क्यों हमारे देश के पढ़े-लिखे, चतुरसुजान, इज्जतदार नौकरशाह भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं?जवाब बहुत सरल है : पैसा। या दूसरे शब्दों में हमारे समाज में पैसे का बढ़ता प्रभाव।

मुझे गलत न समझें। पैसा बहुत जरूरी है। गरीबी एक तरह का रोग है और आज के वक्त में सम्मान से जीवन-यापन करने के लिए एक निश्चित मात्रा में भौतिक संपदा का होना जरूरी है। लेकिन, अक्सर ऐसा पाया जाता है कि लोगों को केवल इन्हीं चीजों के लिए पैसों की जरूरत नहीं होती। हमारे राजनेता और सरकारी अफसर कुछ अन्य कारणों से भी पैसा चुराने के लिए प्रेरित होते हैं। मैं उनमें से कुछ के बारे में बात करना चाहूंगा।

पहला कारण यह कि पैसे से सामाजिक हैसियत हासिल होती है। आपका घर जितना बड़ा होगा, आपकी पार्टियां जितनी शानदार होंगी, आपकी सामाजिक हैसियत में उतना ही इजाफा होगा। ज्यादा से ज्यादा भौतिक चीजों के बाजार में आने से यह धारणा और मजबूत हुई है।

हमारे घर में जो अखबार आते हैं, वे महंगी चीजों के विज्ञापनों से भरे होते हैं, जैसे कि उन्हें खरीदना ही जीवन का सबसे अहम मकसद हो। हमें सबसे अमीर लोगों और सबसे महंगे घरों की फेहरिस्त पढ़ने में मजा आता है। टीवी में महंगी शादियों पर विशेष कार्यक्रम दिखाए जाते हैं।

आज यह स्थिति है कि महंगे गहने और जूतियां पहनने वाली और डिजाइनर बैग रखने वाली किसी महिला की हैसियत सूती कपड़े की साड़ी पहनने वाली किसी स्कूल शिक्षिका की तुलना में ज्यादा समझी जाएगा। मोटी तनख्वाह पाने वाले लोग ज्यादा सुर्खियों में रहते हैं, बनिस्बत उन साहसी पत्रकारों के, जिन्होंने किसी घोटाले का भंडाफोड़ किया है या उन परोपकारी चिकित्सकों के, जो गरीबों का इलाज करते हैं। जाहिर है ऐसे सामाजिक ढांचे में पैसों के प्रति आकर्षण तो होगा ही।

दूसरा कारण यह कि पैसों से सामाजिक सुरक्षा का अहसास होता है। यह धन का वास्तविक लाभ जरूर है, लेकिन राजनेताओं में एक अजीब तरह की असुरक्षा की भावना होती है। यह उनके पेशे की प्रकृति है। किसी भी राजनेता को पता नहीं होता कि वह अगला चुनाव जीतने वाला है या नहीं।

अक्सर राजनेताओं द्वारा हड़पे जाने वालों पैसे का इस्तेमाल पार्टी के प्रचार अभियान में किया जाता है ताकि अगला चुनाव लड़ा जा सके। सत्ता में होना या सत्ता में बरकरार रहना जितना जरूरी है, शायद वास्तविक नेता या आदर्श नेता बनना उतना जरूरी नहीं होता।

नतीजा यह होता है कि हमारे द्वारा चुने गए नेता हमें ही लूटते-खसोटते रहते हैं। और चूंकि भारतीय मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग भ्रष्टाचार वगैरह के आरोपों की परवाह नहीं करता और जाति, धर्म या वंश के आधार पर अपने नेता का चयन करता है, लिहाजा यह सिलसिला जारी रहता है।

बहरहाल, सामाजिक हैसियत और सामाजिक सुरक्षा महज दिमाग की उपज हैं। मजे की बात यह है कि अगर हम भीतर से खुद का मूल्य नहीं समझते, तो चाहे हमारे पास कितना ही पैसा क्यों न हो, हम कभी भी ‘हैसियत’ का अनुभव नहीं कर पाएंगे। इसीलिए तो भ्रष्ट लोग पागलों की तरह पैसों का ढेर लगाते रहते हैं और एक दिन रंगे हाथों धर लिए जाते हैं।

चूंकि उन्होंने पैसा कमाया नहीं, चुराया है, इसलिए उनका जमीर उन्हें कचोटता रहता है और वे कभी चैन से नहीं जी पाते। भ्रष्टाचार से पैसा कमाया जा सकता है, लक्ष्मी नहीं। लक्ष्मी वह संपदा है, जिसे ईमानदारी और नैतिकता से अर्जित किया जाए। लक्ष्मी अपने साथ शांति और संतोष को लेकर आती है।

अगर आप कभी लक्ष्मीजी का चित्र देखें तो आप पाएंगे कि उनके आसपास सोने के सिक्के हैं, लेकिन वे स्वयं कमल के फूल पर विराजमान हैं और उनके हाथों में भी कमल का फूल है। कमल का फूल शुद्धता, शांति, शुचिता, आध्यात्मिक मूल्यों और संसार की कीच में होने के बावजूद सौंदर्य का प्रतीक है। शांति के बिना संपदा का कोई मोल नहीं ।

इस दीपावली पर धन नहीं, लक्ष्मी के लिए प्रार्थना करें। जो लोग भ्रष्टाचार के जरिये पैसों का अंबार लगाते चलते हैं, उन्हें इस अंतर के बारे में नहीं पता। उनकी दीपावली की पार्टियों चाहे कितनी ही आलीशान क्यों न हों, लक्ष्मी उनके घर कभी नहीं आएंगी । - लेखक अंग्रेजी के युवा उपन्यासकार हैं।

युवाओं की ओर से एक चिट्ठी

प्रिय सोनियाजी, मैं स्वयं कभी खुले पत्रों का हिमायती नहीं रहा। आखिर एक ऐसे पत्र को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करने में क्या तुक है, जिसे किसी एक व्यक्ति के लिए लिखा गया हो? बहरहाल सोनियाजी, मेरे पास आपका ईमेल आईडी नहीं है और मुझे नहीं लगता कि आप फेसबुक पर होंगी (ट्विटर पर तो आप निश्चित ही नहीं हैं)। आपको लिखी जाने वाली नियमित चिट्ठियों को आपके सभासदों से होकर आप तक पहुंचने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता होगा। इसीलिए मुझे खुला पत्र ही सबसे अच्छा विकल्प लगा। लेकिन यहां मैं केवल अपनी ही बातें नहीं कह रहा हूं। ये वे बातें हैं, जो आज देश के अधिकांश युवा महसूस करते हैं।

सीधी-सी बात है : देश भ्रष्टाचार से निजात पाना चाहता है और समाधान चाहे जो हों, उन्हें अमल में लाने के लिए आपको एक निर्णायक भूमिका निभानी होगी। मुझे नहीं लगता कि भ्रष्टाचार में आपकी कोई निजी दिलचस्पी होगी। आप जिस पड़ाव पर हैं, उसमें आपके लिए धन की अहमियत बहुत कम होगी। फिर भी पार्टी चलाने के लिए बड़े पैमाने पर धनराशि की दरकार होती है। इसके कारण राजनेताओं को कुछ नैतिक समझौते भी करने पड़ते हैं। आज भ्रष्टाचार के आंकड़े इस सीमा तक पहुंच चुके हैं कि उनकी गिनती करने में किसी डिजिटल केलकुलेटर को भी खासी मुश्किल हो। एक के बाद एक हो रहे घोटाले बताते हैं कि हमने ऐसा तंत्र रचा है, जिसमें बुराई को प्रोत्साहन दिया जाता है और जहां पहली दुनिया का एक हिस्सा बनने के भारत के स्वप्न को लगातार खतरा बना रहता है।

हाल ही में आपके पुत्र राहुल ने कहा था कि भ्रष्टाचार के कारण आम आदमी तक वैश्वीकरण के लाभ नहीं पहुंच पा रहे हैं। यह पूरी तरह सच है। वास्तव में भ्रष्टाचार न केवल हमारे मौजूदा लाभ को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि वह देश के नौजवानों के भविष्य की संभावनाओं को भी क्षति पहुंचाता है। एक अर्थ में भ्रष्टाचार आतंकवाद से भी बदतर है। आतंकवादी सड़कों, हवाई अड्डों और पॉवर प्लांटों को निशाना बनाते हैं और निर्दोष नागरिकों की जान लेते हैं। लेकिन एक भ्रष्टाचारी नेता अस्पताल ही नहीं बनने देता, जिसका मतलब यह होता है कि जिन निर्दोष नागरिकों की जानें बचाई जा सकती थीं, उन्हें नहीं बचाया जा सकता।

आपने कहा था कि भ्रष्टाचार एक रोग है। आपकी इस बात से निराशा झलकती है, क्योंकि रोग तो प्राकृतिक कारणों से होता है। लेकिन भ्रष्टाचार के लिए कोई कीटाणु जिम्मेदार नहीं हैं। भ्रष्टाचार की जड़ है निरंकुश सत्ता। इस बात को एक छोटे-से उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। बिजली का आविष्कार एक महान खोज थी, जिसकी वजह से हमारे घरों में रोशनी हुई और हम सुख-सुविधा के विभिन्न साधनों का उपयोग कर पाए। लेकिन हम तक बिजली पहुंचने से पहले उसे विभिन्न सबस्टेशनों से होकर गुजरना पड़ता है, जहां वोल्टेज और करंट पर नियंत्रण रखा जाता है। यदि बिजली प्रदाय अनियंत्रित हो तो वह हमारे घर में आग भी लगा सकती है। भारत में राजनीतिक तंत्र पूरी तरह निरंकुश है। हमारे सांसदगण अपने आपको कोई जागीरदार समझते हैं। वे अपनी सत्ता का दुरुपयोग करते हुए जो चाहते हैं, करते हैं।

यदि आप इस ‘रोग’ का निदान करना चाहती हैं (जो कि आप कर सकती हैं) तो आपको संसद में एक ‘राजनीतिक उत्तरदायित्व विधेयक’(पॉलिटिकल अकाउंटेबिलिटी बिल) पारित करना होगा। साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक स्वतंत्र परिषद भी गठित करनी होगी। यह परिषद किसी नेता के अधीन नहीं होगी, बल्कि उसके पास यह शक्ति होगी कि वह किसी भी राजनेता पर मुकदमा चला सके। पहली दुनिया के तकरीबन सभी देशों में यह व्यवस्था है। जब तक ये बदलाव नहीं किए जाते, तब तक चाहे कितने ही बेहतरीन भाषण दिए जाते रहें, बीमारी बरकरार रहेगी।

दोषी नेताओं को दंडित करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह समझना है कि नेता आखिर भ्रष्टाचार क्यों करते हैं। आपकी पार्टी के कुछ विचार अच्छे हैं, खासतौर पर युवाओं को राजनीति में सक्रिय करने के लिए बड़े पैमाने पर किए जा रहे प्रयास। आपके पुत्र ने पार्टी के इस संदेश को प्रचारित करने के लिए देशभर की यात्रा की है। लेकिन मैं एक सीधा-सा सवाल पूछना चाहता हूं : जब कोई नौजवान युवा कांग्रेस (या किसी भी पार्टी की युवा शाखा) में शामिल होता है तो क्या होता है? पार्टी के लिए अच्छा प्रदर्शन करने के लिए उसे बहुत ऊर्जा खपानी पड़ती है। लेकिन राजनीतिक दलों के यहां औपचारिक वेतन प्रणाली नहीं होती है। ऐसे में वह युवा कैसे अपना जीवनयापन करेगा? निश्चित ही उसके सामने एकमात्र रास्ता यही रह जाता है कि वह छोटा-मोटा भ्रष्टाचार करे। इसी तरह एक युवा धीरे-धीरे भ्रष्ट व्यक्ति बन जाता है। ऐसी स्थिति में क्या आप किसी शिक्षित प्रबुद्ध युवा को यह सलाह देंगी कि वह राजनीति में आए? इसके स्थान पर अगर एक उपयुक्त वेतन प्रणाली अमल में लाई जाए तो आप पाएंगी कि पेशेवर रूप से कुशल युवा आपकी पार्टी जॉइन कर रहे हैं। जब तक ये सुधार नहीं किए जाते, तब तक युवाओं की सहभागिता का नारा बेकार ही साबित होगा। एक अन्य बेतुका नियम है चुनाव प्रचार अभियान में 25 लाख रुपयों की व्यय सीमा। मेरे सांसद मित्र मुझे बताते हैं कि वास्तव में हर संसदीय क्षेत्र में चुनाव प्रचार अभियान में औसतन छह करोड़ रुपए खर्च होते हैं। यह पैसा कहां से आता है? जाहिर है भ्रष्टाचार के बिना यह संभव नहीं। ऐसे में क्या वैध फंडरेजिंग प्रणालियों का निर्धारण नहीं किया जाना चाहिए?

परिस्थितियों को बदलना आसान नहीं होता, लेकिन इसके बावजूद हमें प्रयास करने होते हैं। अन्य किसी भी व्यक्ति की तुलना में आप देश की स्थिति को बदलने में सर्वाधिक सक्षम हैं। करोड़ों युवा आज आपसे यही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या आप कोई बदलाव लाएंगी?
भवदीय ‘भारत’

चेतन भगत
लेखक अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार हैं।